ज़मीं होगी किसी क़ातिल का दामाँ हम न कहते थे अकारत जाएगा ख़ून-ए-शहीदाँ हम न कहते थे इलाज-ए-चाक-ए-पैराहन हुआ तो इस तरह होगा सिया जाएगा काँटों से गरेबाँ हम न कहते थे तराने कुछ दिए लफ़्ज़ों में ख़ुद को क़ैद कर लेंगे अजब अंदाज़ से फैलेगा ज़िंदाँ हम न कहते थे कोई इतना न होगा लाश भी ले जा के दफ़ना दे इन्हीं सड़कों पे मर जाएगा इंसाँ हम न कहते थे नज़र लिपटी है शोलों में लहू तपता है आँखों में उठा ही चाहता है कोई तूफ़ाँ हम न कहते थे छलकते जाम में भीगी हुई आँखें उतर आईं सताएगी किसी दिन याद-ए-याराँ हम न कहते थे नई तहज़ीब कैसे लखनऊ को रास आएगी उजड़ जाएगा ये शहर-ए-ग़ज़ालाँ हम न कहते थे
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बात ऐसी है ऐसा था पहले दर्द होने पे रोता था पहले जैसे चाहे वो खेला करता था मैं किसी का खिलौना था पहले तुझ पे कितना भरोसा करता था ख़ुद पे कितना भरोसा था पहले आख़िरी रास्ते पे चलने को पैर उस ने उठाया था पहले अब तो तस्वीर तक नहीं बनती मैं तो पैकर बनाता था पहले रौशनी आई जब जला कोई सबकी आँखों पे पर्दा था पहले गिनती पीछे से की गई वरना मेरा नंबर तो पहला था पहले
Himanshi babra KATIB
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इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दर-पेश हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है कि अचानक सुधर गया हूँ मैं
Jaun Elia
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी
Kumar Vishwas
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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हर एक शख़्स परेशान-ओ-दर-बदर सा लगे ये शहर मुझ को तो यारो कोई भँवर सा लगे अब उस के तर्ज़-ए-तजाहुल को क्या कहे कोई वो बे-ख़बर तो नहीं फिर भी बे-ख़बर सा लगे हर एक ग़म को ख़ुशी की तरह बरतना है ये दौर वो है कि जीना भी इक हुनर सा लगे नशात-ए-सोहबत-ए-रिंदाँ बहुत ग़नीमत है कि लम्हा लम्हा पुर-आशोब-ओ-पुर-ख़तर सा लगे किसे ख़बर है कि दुनिया का हश्र क्या होगा कभी कभी तो मुझे आदमी से डर सा लगे वो तुंद वक़्त की रौ है कि पाँव टिक न सकें हर आदमी कोई उखड़ा हुआ शजर सा लगे जहान-ए-नौ के मुकम्मल सिंगार की ख़ातिर सदी सदी का ज़माना भी मुख़्तसर सा लगे
Jaan Nisar Akhtar
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तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा गुज़र ही आए किसी तरह तेरे दीवाने क़दम क़दम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा ये और बात कि हर छेड़ ला-उबाली थी तिरी नज़र का दिलों से मोआ'मला तो रहा
Jaan Nisar Akhtar
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हौसला खो न दिया तेरी नहीं से हम ने कितनी शिकनों को चुना तेरी जबीं से हम ने वो भी क्या दिन थे कि दीवाना बने फिरते थे सुन लिया था तिरे बारे में कहीं से हम ने जिस जगह पहले-पहल नाम तिरा आता है दास्ताँ अपनी सुनाई है वहीं से हम ने यूँँ तो एहसान हसीनों के उठाए हैं बहुत प्यार लेकिन जो किया है तो तुम्हीं से हम ने कुछ समझ कर ही ख़ुदा तुझ को कहा है वर्ना कौन सी बात कही इतने यक़ीं से हम ने
Jaan Nisar Akhtar
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ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था मुआ'फ़ कर न सकी मेरी ज़िंदगी मुझ को वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे कुछ इस कमाल से तू ने बदन चुराया था पता नहीं कि मिरे बा'द उन पे क्या गुज़री मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था
Jaan Nisar Akhtar
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वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं उन को न पुकारो ग़म-ए-दौराँ के लक़ब से जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं हम भी तिरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं अल्फ़ाज़ में इज़हार-ए-मोहब्बत के तरीक़े ख़ुद इश्क़ की नज़रों में भी मायूब रहे हैं इस अहद-ए-बसीरत में भी नक़्क़ाद हमारे हर एक बड़े नाम से मरऊब रहे हैं इतना भी न घबराओ नई तर्ज़-ए-अदास हर दौर में बदले हुए उस्लूब रहे हैं
Jaan Nisar Akhtar
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