ghazalKuch Alfaaz

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है समुंदरों ही के लहजे में बात करता है खुली छतों के दिए कब के बुझ गए होते कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है ये देखना है कि सहरा भी है समुंदर भी वो मेरी तिश्ना-लबी किस के नाम करता है तुम आ गए हो तो कुछ चाँदनी सी बातें हों ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है ज़मीं की कैसी वकालत हो फिर नहीं चलती जब आसमाँ से कोई फ़ैसला उतरता है

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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कुछ इतना ख़ौफ़ का मारा हुआ भी प्यार न हो वो ए'तिबार दिलाए और ए'तिबार न हो हवा ख़िलाफ़ हो मौजों पे इख़्तियार न हो ये कैसी ज़िद है कि दरिया किसी से पार न हो मैं गाँव लौट रहा हूँ बहुत दिनों के बा'द ख़ुदा करे कि उसे मेरा इंतिज़ार न हो ज़रा सी बात पे घुट घुट के सुब्ह कर देना मिरी तरह भी कोई मेरा ग़म-गुसार न हो दुखी समाज में आँसू भरे ज़माने में उसे ये कौन बताए कि अश्क-बार न हो गुनाहगारों पे उँगली उठाए देते हो 'वसीम' आज कहीं तुम भी संगसार न हो

Waseem Barelvi

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हम अपने आप को इक मसअला बना न सके इसी लिए तो किसी की नज़र में आ न सके हम आँसुओं की तरह वास्ते निभा न सके रहे जिन आँखों में उन में ही घर बना न सके फिर आँधियों ने सिखाया वहाँ सफ़र का हुनर जहाँ चराग़ हमें रास्ता दिखा न सके जो पेश पेश थे बस्ती बचाने वालों में लगी जब आग तो अपना भी घर बचा न सके मिरे ख़ुदा किसी ऐसी जगह उसे रखना जहाँ कोई मिरे बारे में कुछ बता न सके तमाम उम्र की कोशिश का बस यही हासिल किसी को अपने मुताबिक़ कोई बना न सके तसल्लियों पे बहुत दिन जिया नहीं जाता कुछ ऐसा हो के तिरा ए'तिबार आ न सके

Waseem Barelvi

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निगाहों के तक़ाज़े चैन से मरने नहीं देते यहाँ मंज़र ही ऐसे हैं कि दिल भरने नहीं देते ये लोग औरों के दुख जीने निकल आए हैं सड़कों पर अगर अपना ही ग़म होता तो यूँँ धरने नहीं देते यही क़तरे जो दम अपना दिखाने पर उतर आते समुंदर ऐसी मन-मानी तुझे करने नहीं देते क़लम मैं तो उठा के जाने कब का रख चुका होता मगर तुम हो के क़िस्सा मुख़्तसर करने नहीं देते हमीं उन से उमीदें आसमाँ छूने की करते हैं हमीं बच्चों को अपने फ़ैसले करने नहीं देते

Waseem Barelvi

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वो मुझ को क्या बताना चाहता है जो दुनिया से छुपाना चाहता है मुझे देखो कि मैं उस को ही चाहूँ जिसे सारा ज़माना चाहता है क़लम करना कहाँ है उस का मंशा वो मेरा सर झुकाना चाहता है शिकायत का धुआँ आँखों से दिल तक तअ'ल्लुक़ टूट जाना चाहता है तक़ाज़ा वक़्त का कुछ भी हो ये दिल वही क़िस्सा पुराना चाहता है

Waseem Barelvi

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अँधेरा ज़ेहन का सम्त-ए-सफ़र जब खोने लगता है किसी का ध्यान आता है उजाला होने लगता है वो जितनी दूर हो उतना ही मेरा होने लगता है मगर जब पास आता है तो मुझ से खोने लगता है किसी ने रख दिए ममता-भरे दो हाथ क्या सर पर मिरे अंदर कोई बच्चा बिलक कर रोने लगता है मोहब्बत चार दिन की और उदासी ज़िंदगी भर की यही सब देखता है और 'कबीरा' रोने लगता है समझते ही नहीं नादान कै दिन की है मिल्किय्यत पराए खेतों पे अपनों में झगड़ा होने लगता है ये दिल बच कर ज़माने भर से चलना चाहे है लेकिन जब अपनी राह चलता है अकेला होने लगता है

Waseem Barelvi

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