ghazalKuch Alfaaz

ज़िद है उन्हें पूरा मिरा अरमाँ न करेंगे मुँह से जो नहीं निकली है अब हाँ न करेंगे क्यूँँ ज़ुल्फ़ का बोसा मुझे लेने नहीं देते कहते हैं कि वल्लाह परेशाँ न करेंगे है ज़ेहन में इक बात तुम्हारे मुतअल्लिक़ ख़ल्वत में जो पूछोगे तो पिन्हाँ न करेंगे वाइज़ तो बनाते हैं मुसलमान को काफ़िर अफ़्सोस ये काफ़िर को मुसलमाँ न करेंगे क्यूँँ शुक्र-गुज़ारी का मुझे शौक़ है इतना सुनता हूँ वो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे दीवाना न समझे हमें वो समझे शराबी अब चाक कभी जेब ओ गरेबाँ न करेंगे वो जानते हैं ग़ैर मिरे घर में है मेहमाँ आएँगे तो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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नहीं आता किसी पर दिल हमारा वही कश्ती वही साहिल हमारा तेरे दर पर करेंगे नौकरी हम तेरी गलियाँ हैं मुस्तक़बिल हमारा कभी मिलता था कोई होटलों में कभी भरता था कोई बिल हमारा

Tehzeeb Hafi

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल तू भी हो जाएगा बदनाम मिरे साथ न चल तू नई सुब्ह के सूरज की है उजली सी किरन मैं हूँ इक धूल भरी शाम मिरे साथ न चल अपनी ख़ुशियाँ मिरे आलाम से मंसूब न कर मुझ से मत माँग मिरा नाम मिरे साथ न चल तू भी खो जाएगी टपके हुए आँसू की तरह देख ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मिरे साथ न चल मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा 'शकील' टूटता रहता हूँ हर गाम मिरे साथ न चल

Shakeel Azmi

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वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे चाँद कहते हैं किसे ख़ूब समझते होंगे इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे मैं समझता था मोहब्बत की ज़बाँ ख़ुशबू है फूल से लोग उसे ख़ूब समझते होंगे देख कर फूल के औराक़ पे शबनम कुछ लोग तिरा अश्कों भरा मक्तूब समझते होंगे भूल कर अपना ज़माना ये ज़माने वाले आज के प्यार को मायूब समझते होंगे

Bashir Badr

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हंगामा है क्या बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है वाँ दिल में कि सद में दो याँ जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्में हैं बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है

Akbar Allahabadi

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तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है बला के पेच में आया हुआ है न क्यूँँकर बू-ए-ख़ूँ ना में से आए उसी जल्लाद का लिक्खा हुआ है चले दुनिया से जिस की याद में हम ग़ज़ब है वो हमें भूला हुआ है कहूँ क्या हाल अगली इशरतों का वो था इक ख़्वाब जो भूला हुआ है जफ़ा हो या वफ़ा हम सब में ख़ुश हैं करें क्या अब तो दिल अटका हुआ है हुई है इश्क़ ही से हुस्न की क़द्र हमीं से आप का शोहरा हुआ है बुतों पर रहती है माइल हमेशा तबीअत को ख़ुदाया क्या हुआ है परेशाँ रहते हो दिन रात 'अकबर' ये किस की ज़ुल्फ़ का सौदा हुआ है

Akbar Allahabadi

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अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए अख़बार में तो नाम मिरा छाप दीजिए देखो जिसे वो पाइनियर ऑफ़िस में है डटा बहर-ए-ख़ुदा मुझे भी कहीं छाप दीजिए चश्म-ए-जहाँ से हालत-ए-असली छुपी नहीं अख़बार में जो चाहिए वो छाप दीजिए दावा बहुत बड़ा है रियाज़ी में आप को तूल-ए-शब-ए-फ़िराक़ को तो नाप दीजिए सुनते नहीं हैं शैख़ नई रौशनी की बात इंजन की उन के कान में अब भाप दीजिए इस बुत के दर पे ग़ैर से 'अकबर' ने कह दिया ज़र ही मैं देने लाया हूँ जान आप दीजिए

Akbar Allahabadi

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हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए मंज़िल-ए-हस्ती नहीं है दिल लगाने के लिए क्या मुझे ख़ुश आए ये हैरत-सरा-ए-बे-सबात होश उड़ने के लिए है जान जाने के लिए दिल ने देखा है बिसात-ए-क़ुव्वत-ए-इदराक को क्या बढ़े इस बज़्म में आँखें उठाने के लिए ख़ूब उम्मीदें बंधीं लेकिन हुईं हिरमाँ नसीब बदलियाँ उट्ठीं मगर बिजली गिराने के लिए साँस की तरकीब पर मिट्टी को प्यार आ ही गया ख़ुद हुई क़ैद उस को सीने से लगाने के लिए जब कहा मैं ने भुला दो ग़ैर को हँस कर कहा याद फिर मुझ को दिलाना भूल जाने के लिए दीदा-बाज़ी वो कहाँ आँखें रहा करती हैं बंद जान ही बाक़ी नहीं अब दिल लगाने के लिए मुझ को ख़ुश आई है मस्ती शैख़ जी को फ़रबही मैं हूँ पीने के लिए और वो हैं खाने के लिए अल्लाह अल्लाह के सिवा आख़िर रहा कुछ भी न याद जो किया था याद सब था भूल जाने के लिए सुर कहाँ के साज़ कैसा कैसी बज़्म-ए-सामईन जोश-ए-दिल काफ़ी है 'अकबर' तान उड़ाने के लिए

Akbar Allahabadi

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ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता आँख उन से जो मिलती है तो क्या क्या नहीं होता जल्वा न हो मा'नी का तो सूरत का असर क्या बुलबुल गुल-ए-तस्वीर का शैदा नहीं होता अल्लाह बचाए मरज़-ए-इश्क़ से दिल को सुनते हैं कि ये आरिज़ा अच्छा नहीं होता तश्बीह तिरे चेहरे को क्या दूँ गुल-ए-तर से होता है शगुफ़्ता मगर इतना नहीं होता मैं नज़्अ' में हूँ आएँ तो एहसान है उन का लेकिन ये समझ लें कि तमाशा नहीं होता हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

Akbar Allahabadi

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