अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए अख़बार में तो नाम मिरा छाप दीजिए देखो जिसे वो पाइनियर ऑफ़िस में है डटा बहर-ए-ख़ुदा मुझे भी कहीं छाप दीजिए चश्म-ए-जहाँ से हालत-ए-असली छुपी नहीं अख़बार में जो चाहिए वो छाप दीजिए दावा बहुत बड़ा है रियाज़ी में आप को तूल-ए-शब-ए-फ़िराक़ को तो नाप दीजिए सुनते नहीं हैं शैख़ नई रौशनी की बात इंजन की उन के कान में अब भाप दीजिए इस बुत के दर पे ग़ैर से 'अकबर' ने कह दिया ज़र ही मैं देने लाया हूँ जान आप दीजिए
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
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हंगामा है क्या बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है वाँ दिल में कि सद में दो याँ जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्में हैं बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है
Akbar Allahabadi
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ज़िद है उन्हें पूरा मिरा अरमाँ न करेंगे मुँह से जो नहीं निकली है अब हाँ न करेंगे क्यूँँ ज़ुल्फ़ का बोसा मुझे लेने नहीं देते कहते हैं कि वल्लाह परेशाँ न करेंगे है ज़ेहन में इक बात तुम्हारे मुतअल्लिक़ ख़ल्वत में जो पूछोगे तो पिन्हाँ न करेंगे वाइज़ तो बनाते हैं मुसलमान को काफ़िर अफ़्सोस ये काफ़िर को मुसलमाँ न करेंगे क्यूँँ शुक्र-गुज़ारी का मुझे शौक़ है इतना सुनता हूँ वो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे दीवाना न समझे हमें वो समझे शराबी अब चाक कभी जेब ओ गरेबाँ न करेंगे वो जानते हैं ग़ैर मिरे घर में है मेहमाँ आएँगे तो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे
Akbar Allahabadi
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कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इस की मुश्क़िल है यहाँ परियों का मजमा है, वहाँ हूरों की महफ़िल है इलाही कैसी-कैसी सूरतें तू ने बनाई हैं हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है, मेरा दिल है जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर अरे तू कौन है, हट सामने से क्यूँ मुक़ाबिल है हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है
Akbar Allahabadi
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फिर गई आप की दो दिन में तबीअ'त कैसी ये वफ़ा कैसी थी साहब ये मुरव्वत कैसी दोस्त अहबाब से हँस बोल के कट जाएगी रात रिंद-ए-आज़ाद हैं हम को शब-ए-फ़ुर्क़त कैसी जिस हसीं से हुई उल्फ़त वही माशूक़ अपना इश्क़ किस चीज़ को कहते हैं तबीअ'त कैसी है जो क़िस्मत में वही होगा न कुछ कम न सिवा आरज़ू कहते हैं किस चीज़ को हसरत कैसी हाल खुलता नहीं कुछ दिल के धड़कने का मुझे आज रह रह के भर आती है तबीअ'त कैसी कूचा-ए-यार में जाता तो नज़ारा करता क़ैस आवारा है जंगल में ये वहशत कैसी
Akbar Allahabadi
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रंग-ए-शराब से मिरी निय्यत बदल गई वाइज़ की बात रह गई साक़ी की चल गई तय्यार थे नमाज़ पे हम सुन के ज़िक्र-ए-हूर जल्वा बुतों का देख के निय्यत बदल गई मछली ने ढील पाई है लुक़्में पे शाद है सय्याद मुतमइन है कि काँटा निगल गई चमका तिरा जमाल जो महफ़िल में वक़्त-ए-शाम परवाना बे-क़रार हुआ शम्अ' जल गई उक़्बा की बाज़-पुर्स का जाता रहा ख़याल दुनिया की लज़्ज़तों में तबीअत बहल गई हसरत बहुत तरक़्क़ी-ए-दुख़्तर की थी उन्हें पर्दा जो उठ गया तो वो आख़िर निकल गई
Akbar Allahabadi
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