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ज़िंदगी तुझ को जिया है कोई अफ़्सोस नहीं ज़हर ख़ुद मैं ने पिया है कोई अफ़्सोस नहीं मैं ने मुजरिम को भी मुजरिम न कहा दुनिया में बस यही जुर्म किया है कोई अफ़्सोस नहीं मेरी क़िस्मत में लिखे थे ये उन्हीं के आँसू दिल के ज़ख़्मों को सिया है कोई अफ़्सोस नहीं अब गिरे संग कि शीशों की हो बारिश 'फ़ाकिर' अब कफ़न ओढ़ लिया है कोई अफ़्सोस नहीं

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ग़म बढे़ आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह तुम छिपा लो मुझे ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह अपनी नज़रों में गुनाहगार न होते, क्यूँ कर दिल ही दुश्मन हैं मुख़ालिफ़ के गवाहों की तरह हर तरफ़ ज़ीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त बस तेरी याद के साए हैं पनाहों की तरह जिन के ख़ातिर कभी इल्ज़ाम उठाए, "फ़ाकिर" वो भी पेश आए हैं इंसाफ़ के शाहों की तरह

Sudarshan Fakir

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पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसाँ पाए हैं तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं बुत-ख़ाना समझते हो जिस को पूछो न वहाँ क्या हालत है हम लोग वहीं से लौटे हैं बस शुक्र करो लौट आए हैं हम सोच रहे हैं मुद्दत से अब उम्र गुज़ारें भी तो कहाँ सहरा में ख़ुशी के फूल नहीं शहरों में ग़मों के साए हैं होंठों पे तबस्सुम हल्का सा आँखों में नमी सी है 'फ़ाकिर' हम अहल-ए-मोहब्बत पर अक्सर ऐसे भी ज़माने आए हैं

Sudarshan Fakir

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फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आए सवालों की तरह  हम परेशाँ ही रहे अपने ख़यालों की तरह  शीशागर बैठे रहे ज़िक्र-ए-मसीहा ले कर  और हम टूट गए काँच के प्यालों की तरह  जब भी अंजाम-ए-मोहब्बत ने पुकारा ख़ुद को  वक़्त ने पेश किया हम को मिसालों की तरह  ज़िक्र जब होगा मोहब्बत में तबाही का कहीं  याद हम आएँगे दुनिया को हवालों की तरह

Sudarshan Fakir

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कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया और कुछ तल्ख़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया हम तो समझे थे के बरसात में बरसेगी शराब आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया दिल तो रोता रहे और आँख से आँसू न बहे इश्क़ की ऐसी रिवायात ने दिल तोड़ दिया वो मिरे हैं मुझे मिल जाएँगे आ जाएँगे ऐसे बेकार ख़यालात ने दिल तोड़ दिया आप को प्यार है मुझ से कि नहीं है मुझ से जाने क्यूँँ ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया

Sudarshan Fakir

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आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा वही ख़ुदा देगा मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा ज़िन्दगी को क़रीब से देखो इस का चेहरा तुम्हें रुला देगा हम सेे पूछो दोस्ती का सिला दुश्मनों का भी दिल हिला देगा इश्क़ का ज़हर पी लिया 'फ़ाकिर' अब मसीहा भी क्या दवा देगा

Sudarshan Fakir

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