पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसाँ पाए हैं तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं बुत-ख़ाना समझते हो जिस को पूछो न वहाँ क्या हालत है हम लोग वहीं से लौटे हैं बस शुक्र करो लौट आए हैं हम सोच रहे हैं मुद्दत से अब उम्र गुज़ारें भी तो कहाँ सहरा में ख़ुशी के फूल नहीं शहरों में ग़मों के साए हैं होंठों पे तबस्सुम हल्का सा आँखों में नमी सी है 'फ़ाकिर' हम अहल-ए-मोहब्बत पर अक्सर ऐसे भी ज़माने आए हैं
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
Jaun Elia
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फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आए सवालों की तरह हम परेशाँ ही रहे अपने ख़यालों की तरह शीशागर बैठे रहे ज़िक्र-ए-मसीहा ले कर और हम टूट गए काँच के प्यालों की तरह जब भी अंजाम-ए-मोहब्बत ने पुकारा ख़ुद को वक़्त ने पेश किया हम को मिसालों की तरह ज़िक्र जब होगा मोहब्बत में तबाही का कहीं याद हम आएँगे दुनिया को हवालों की तरह
Sudarshan Fakir
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ग़म बढे़ आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह तुम छिपा लो मुझे ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह अपनी नज़रों में गुनाहगार न होते, क्यूँ कर दिल ही दुश्मन हैं मुख़ालिफ़ के गवाहों की तरह हर तरफ़ ज़ीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त बस तेरी याद के साए हैं पनाहों की तरह जिन के ख़ातिर कभी इल्ज़ाम उठाए, "फ़ाकिर" वो भी पेश आए हैं इंसाफ़ के शाहों की तरह
Sudarshan Fakir
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आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा वही ख़ुदा देगा मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा ज़िन्दगी को क़रीब से देखो इस का चेहरा तुम्हें रुला देगा हम सेे पूछो दोस्ती का सिला दुश्मनों का भी दिल हिला देगा इश्क़ का ज़हर पी लिया 'फ़ाकिर' अब मसीहा भी क्या दवा देगा
Sudarshan Fakir
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ज़िंदगी तुझ को जिया है कोई अफ़्सोस नहीं ज़हर ख़ुद मैं ने पिया है कोई अफ़्सोस नहीं मैं ने मुजरिम को भी मुजरिम न कहा दुनिया में बस यही जुर्म किया है कोई अफ़्सोस नहीं मेरी क़िस्मत में लिखे थे ये उन्हीं के आँसू दिल के ज़ख़्मों को सिया है कोई अफ़्सोस नहीं अब गिरे संग कि शीशों की हो बारिश 'फ़ाकिर' अब कफ़न ओढ़ लिया है कोई अफ़्सोस नहीं
Sudarshan Fakir
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इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया आप कहते थे कि रोने से न बदलेंगे नसीब उम्र भर आप की इस बात ने रोने न दिया रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें जिन को मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया तुझ से मिल कर हमें रोना था बहुत रोना था तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें 'फ़ाकिर' हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया
Sudarshan Fakir
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