ज़ियादा कुछ नहीं हिम्मत तो कर ही सकते हैं इक अच्छे काम की निय्यत तो कर ही सकते हैं ख़ुदा के हाथ से लिक्खा मुक़द्दर अपनी जगह हम उस के बन्दे हैं मेहनत तो कर ही सकते हैं ग़रीब लोग मरम्मत न कर सकें तो क्या शिकस्ता घर की हिफ़ाज़त तो कर ही सकते हैं हमारे बच्चे इजाज़त तलब नहीं करते मगर बताने की ज़हमत तो कर ही सकते हैं हज़ारों साल गुज़ारे हैं मुक़तदी रह कर इक-आध बार इमामत तो कर ही सकते हैं तो क्या हुआ जो शरीके-हयात बन न सके तुम्हारी शादी में शिरकत तो कर ही सकते हैं
Related Ghazal
वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
81 likes
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
81 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
More from Zia Mazkoor
फ़ोन तो दूर वहाँ ख़त भी नहीं पहुँचेंगे अब के ये लोग तुम्हें ऐसी जगह भेजेंगे ज़िंदगी देख चुके तुझ को बड़े पर्दे पर आज के बअ'द कोई फ़िल्म नहीं देखेंगे मसअला ये है मैं दुश्मन के क़रीं पहुँचूँगा और कबूतर मिरी तलवार पे आ बैठेंगे हम को इक बार किनारों से निकल जाने दो फिर तो सैलाब के पानी की तरह फैलेंगे तू वो दरिया है अगर जल्दी नहीं की तू ने ख़ुद समुंदर तुझे मिलने के लिए आएँगे सग़ा-ए-राज़ में रक्खेंगे नहीं इश्क़ तिरा हम तिरे नाम से ख़ुशबू की दुकाँ खोलेंगे
Zia Mazkoor
13 likes
इस सेे आप का दुख भी हो जाएगा अच्छा ख़ासा कम मुझ पर गुज़रे लम्हों में से कर दो बस एक लम्हा कम बड़े-बड़े शहरों में कोई कैसे किसी से प्यार करे जितने आमने सामने घर है उतना आना जाना कम उस के पिस्टल से एक गोली कम होने का मतलब है अपने शहर में उड़ने वाले गोल से एक परिंदा कम कल तो वो और उस की कश्ती बस जलने ही वाले थे दरिया उस पर काफी गरम था लेकिन आग से थोड़ा कम सदके जाऊँ उन चीज़ों पर जिन को उस के हाथ लगे अजब मैकेनिक था वो जिस ने तोड़ा ज़्यादा जोड़ा कम
Zia Mazkoor
15 likes
शाह से छुपके क़ैदी ने शहज़ादी को पैगाम लिखा जंग से भागने वालों में शहज़ादे का भी नाम लिखा दूरदराज़ से आने वाले ख़त मेरी हम सेाही के थे इक दिन उस ने हिम्मत कर के अपना असली नाम लिखा हम दोनों ने अपने अपने दीन पे क़ाएम रहना था घर की इक दीवार पे अल्लाह इक दीवार पे राम लिखा एक मोहब्बत ख़त्म हुई तो दूसरी की तैयारी की नई कहानी के आगाज में पहली का अंजाम लिखा
Zia Mazkoor
17 likes
हमारे साथ कोई मसअला फुरात का है वगरना इल्म उसे अपनी मुश्किलात का है मेरे हिसाब से माज़ुरी हुस्न है मेरा अगर ये ऐब है तो भी ख़ुदा के हाथ का है इक आधे काम के ह़क़ में तो ख़ैर मैं भी हूँ तुम्हारे पास तो दफ़्तर शिफारिशात का है हमारी बात का जितना वसीअ पहलू है ज़बाँ पे लाने में नुक़सान काइनात का है हम उस के होने ना होने पे कितना लड़ रहे हैं किसी के वास्ते ये खेल नफ्सियात का है
Zia Mazkoor
8 likes
इक ज़रा सा टूट कर मिस्मार हो जाता है क्या आईने का आईना बेकार हो जाता है क्या आज कल मायूस वापस आ रहे हैं क़ाफ़िले आज कल उस दर से भी इनकार हो जाता है क्या हाथ पाँव मारने से हो नहीं सकता अगर डूब जाने से समुंदर पार हो जाता है क्या आलम-ए-तन्हाई में भी उस का ऐसा ख़ौफ़ है ज़ेहन में होता है क्या इज़हार हो जाता है क्या हाए उस का इस क़दर मासूमियत से पूछना लड़कियों को लड़कियों से प्यार हो जाता है क्या
Zia Mazkoor
28 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Zia Mazkoor.
Similar Moods
More moods that pair well with Zia Mazkoor's ghazal.







