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शाह से छुपके क़ैदी ने शहज़ादी को पैगाम लिखा जंग से भागने वालों में शहज़ादे का भी नाम लिखा दूरदराज़ से आने वाले ख़त मेरी हम सेाही के थे इक दिन उस ने हिम्मत कर के अपना असली नाम लिखा हम दोनों ने अपने अपने दीन पे क़ाएम रहना था घर की इक दीवार पे अल्लाह इक दीवार पे राम लिखा एक मोहब्बत ख़त्म हुई तो दूसरी की तैयारी की नई कहानी के आगाज में पहली का अंजाम लिखा

Zia Mazkoor17 Likes

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सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए मैं ने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए

Rahat Indori

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जुदाई का ज़माना यूँँ ठिकाने लग गया था बिछड़ कर उस सेे मैं लिखने लिखाने लग गया था तभी तो ज़ंग आलूदा हुई तलवार मेरी मैं दुश्मन पर मुहब्बत आज़माने लग गया था अभी समझा रहा था वो मुझे बोसे का मतलब कि मैं शहतूत के रस में नहाने लग गया था मोहब्बत हो नहीं पाई तो उस का क्या करूँँ मैं कि मैं तो उस गली में आने जाने लगे गया था तभी तो मेरी आँखों को नहीं रोने की आदत मैं छोटी उम्र में आँसू छुपाने लग गया था

Abbas Tabish

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अभी इक शोर सा उठा है कहीं कोई ख़ामोश हो गया है कहीं है कुछ ऐसा कि जैसे ये सब कुछ इस से पहले भी हो चुका है कहीं तुझ को क्या हो गया कि चीज़ों को कहीं रखता है ढूँढ़ता है कहीं जो यहाँ से कहीं न जाता था वो यहाँ से चला गया है कहीं आज शमशान की सी बू है यहाँ क्या कोई जिस्म जल रहा है कहीं हम किसी के नहीं जहाँ के सिवा ऐसी वो ख़ास बात क्या है कहीं तू मुझे ढूँड मैं तुझे ढूँडूँ कोई हम में से रह गया है कहीं कितनी वहशत है दरमियान-ए-हुजूम जिस को देखो गया हुआ है कहीं मैं तो अब शहर में कहीं भी नहीं क्या मिरा नाम भी लिखा है कहीं इसी कमरे से कोई हो के विदाअ'' इसी कमरे में छुप गया है कहीं मिल के हर शख़्स से हुआ महसूस मुझ से ये शख़्स मिल चुका है कहीं

Jaun Elia

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यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे मैं समझता था मिरे यार समझते हैं मुझे जड़ उखड़ने से झुकाव है मिरी शाख़ों में दूर से लोग समर-बार समझते हैं मुझे क्या ख़बर कल यही ताबूत मिरा बन जाए आप जिस तख़्त का हक़दार समझते हैं मुझे नेक लोगों में मुझे नेक गिना जाता है और गुनहगार गुनहगार समझते हैं मुझे मैं तो ख़ुद बिकने को बाज़ार में आया हुआ हूँ और दुकाँ-दार ख़रीदार समझते हैं मुझे मैं बदलते हुए हालात में ढल जाता हूँ देखने वाले अदाकार समझते हैं मुझे वो जो उस पार हैं इस पार मुझे जानते हैं ये जो इस पार हैं उस पार समझते हैं मुझे मैं तो यूँँ चुप हूँ कि अंदर से बहुत ख़ाली हूँ और ये लोग पुर-असरार समझते हैं मुझे रौशनी बाँटता हूँ सरहदों के पार भी मैं हम-वतन इस लिए ग़द्दार समझते हैं मुझे जुर्म ये है कि इन अंधों में हूँ आँखों वाला और सज़ा ये है कि सरदार समझते हैं मुझे लाश की तरह सर-ए-आब हूँ मैं और 'शाहिद' डूबने वाले मदद-गार समझते हैं मुझे

Shahid Zaki

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सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं माँगा ख़ुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं सोचा तुझे देखा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे मेरी ख़ता मेरी वफ़ा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर भेजा वही काग़ज़ उसे हम ने लिखा कुछ भी नहीं इक शाम के साए तले बैठे रहे वो देर तक आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं एहसास की ख़ुशबू कहाँ आवाज़ के जुगनू कहाँ ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं दो-चार दिन की बात है दिल ख़ाक में मिल जाएगा जब आग पर काग़ज़ रखा बाक़ी बचा कुछ भी नहीं

Bashir Badr

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न चलती है न रुकती है फ़क़ीरा तिरी दुनिया भी अच्छी है फ़क़ीरा तुम्हें हटना पड़ेगा रास्ते से ये शाहों की सवारी है फ़क़ीरा हमारे ना-तवाँ कंधों पे मत रख तसव्वुफ़ भारी गठरी है फ़क़ीरा तिरी गद्दी को ले कर इतने झगड़े अभी तो पहली पीढ़ी है फ़क़ीरा फ़क़त ये सोच कर ख़ामोश हूँ मैं तुम्हारी रोज़ी-रोटी है फ़क़ीरा हम उस के आस्तां तक कैसे पहुँचे बड़ी लंबी कहानी है फ़क़ीरा हमारे मानने वालों में हो जा हमारा फ़ैज़ जारी है फ़क़ीरा

Zia Mazkoor

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इस सेे आप का दुख भी हो जाएगा अच्छा ख़ासा कम मुझ पर गुज़रे लम्हों में से कर दो बस एक लम्हा कम बड़े-बड़े शहरों में कोई कैसे किसी से प्यार करे जितने आमने सामने घर है उतना आना जाना कम उस के पिस्टल से एक गोली कम होने का मतलब है अपने शहर में उड़ने वाले गोल से एक परिंदा कम कल तो वो और उस की कश्ती बस जलने ही वाले थे दरिया उस पर काफी गरम था लेकिन आग से थोड़ा कम सदके जाऊँ उन चीज़ों पर जिन को उस के हाथ लगे अजब मैकेनिक था वो जिस ने तोड़ा ज़्यादा जोड़ा कम

Zia Mazkoor

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हमारे साथ कोई मसअला फुरात का है वगरना इल्म उसे अपनी मुश्किलात का है मेरे हिसाब से माज़ुरी हुस्न है मेरा अगर ये ऐब है तो भी ख़ुदा के हाथ का है इक आधे काम के ह़क़ में तो ख़ैर मैं भी हूँ तुम्हारे पास तो दफ़्तर शिफारिशात का है हमारी बात का जितना वसीअ पहलू है ज़बाँ पे लाने में नुक़सान काइ‌नात का है हम उस के होने ना होने पे कितना लड़ रहे हैं किसी के वास्ते ये खेल नफ्सियात का है

Zia Mazkoor

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किस तरह ईमान लाऊँ ख़्वाब की ता'बीर पर छिपकली चढ़ते हुए देखी है उस तस्वीर पर उस ने ऐसी कोठरी में क़ैद रक्खा था हमें रौशनी आँखों पे पड़ती थी या फिर ज़ंजीर पर माएँ बेटों से ख़फ़ा हैं और बेटे माँओं से इश्क़ ग़ालिब आ गया है दूध की तासीर पर मैं उन्हीं आबादियों में जी रहा होता कहीं तुम अगर हँसते नहीं उस दिन मेरी तक़दीर पर

Zia Mazkoor

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हम तो आपसे अच्छी बातें करते हैं आप ही हम से ऐसी बातें करते हैं मिलने पर चुप लग जाती है दोनों को फ़ोन पर अच्छी खासी बातें करते हैं लोग तो करते होंगे उस के बारे में पर जो शहर के दर्ज़ी बातें करते हैं बिन देखे ईमान नहीं ला सकता मैं और वो ग़ैर-यक़ीनी बातें करते हैं पीर फ़कीर तो चुप ही रहते हैं "मज़कूर" दुनियादार ही दीनी बातें करते हैं

Zia Mazkoor

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