जुदाई का ज़माना यूँँ ठिकाने लग गया था बिछड़ कर उस सेे मैं लिखने लिखाने लग गया था तभी तो ज़ंग आलूदा हुई तलवार मेरी मैं दुश्मन पर मुहब्बत आज़माने लग गया था अभी समझा रहा था वो मुझे बोसे का मतलब कि मैं शहतूत के रस में नहाने लग गया था मोहब्बत हो नहीं पाई तो उस का क्या करूँँ मैं कि मैं तो उस गली में आने जाने लगे गया था तभी तो मेरी आँखों को नहीं रोने की आदत मैं छोटी उम्र में आँसू छुपाने लग गया था
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया
Tehzeeb Hafi
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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है
Ali Zaryoun
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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कोई टकरा के सुबुक-सर भी तो हो सकता है मेरी ता'मीर में पत्थर भी तो हो सकता है क्यूँँ न ऐ शख़्स तुझे हाथ लगा कर देखूँ तू मिरे वहम से बढ़ कर भी तो हो सकता है तू ही तू है तो फिर अब जुमला जमाल-ए-दुनिया तेरा शक और किसी पर भी तो हो सकता है ये जो है फूल हथेली पे इसे फूल न जान मेरा दिल जिस्म से बाहर भी तो हो सकता है शाख़ पर बैठे परिंदे को उड़ाने वाले पेड़ के हाथ में पत्थर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि बाहर ही नुमू हो मेरी मेरा खिलना मिरे अंदर भी तो हो सकता है ये जो है रेत का टीला मिरे क़दमों के तले कोई दम में मिरे ऊपर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि हम हार के जीतें 'ताबिश' इश्क़ का खेल बराबर भी तो हो सकता है
Abbas Tabish
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तुम हो तो क़रीब और क़रीब-ए-रग-ए-जाँ हो फिर क्यूँ ये मुझे पूछना पड़ता है कहाँ हो मुमकिन है कि इस बाग़ में दम घुटने का बायस ख़ुश्बू जिसे कहते हैं वो फूलों का धुआँ हो तुम सेे तो पढ़ी जाती नहीं अश्कों की सतरें जैसे ये किसी और जहाँ की ज़बाँ हो इस तरह सरे-फ़र्श-ए-'अज़ा बैठी है 'ताबिश' जैसे ये उदासी किसी मक़तूल की माँ हो माँ थी तो मुझे रात नहीं पड़ती थी बाहर अब कोई नहीं पूछता 'अब्बास' कहाँ हो
Abbas Tabish
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मेरी तन्हाई बढ़ाते हैं चले जाते हैं हंस तालाब पे आते हैं चले जाते हैं इस लिए अब मैं किसी को नहीं जाने देता जो मुझे छोड़ के जाते हैं चले जाते हैं मेरी आँखों से बहा करती है उन की ख़ुशबू रफ़्तगाँ ख़्वाब में आते हैं चले जाते हैं शादी -इ -मार्ग का माहौल बना रहता है आप आते हैं रुलाते हैं चले जाते हैं कब तुम्हें इश्क़ पे मजबूर किया है हम ने हम तो बस याद दिलाते हैं चले जाते हैं आप को कौन तमाशाई समझता है यहाँ आप तो आग लगते हैं चले जाते हैं हाथ पत्थर को बाधाओं तो सगण -इ -दुनिया हैरती बन के दिखते हैं चले जाते हैं
Abbas Tabish
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टूटते इश्क़ में कुछ हाथ बँटाते जाते सारा मलबा मेरे ऊपर न गिराते जाते इतनी उजलत में भी क्या आँख से ओझल होना जा रहे थे तो मुझे तुम नज़र आते जाते कम से कम रखता पलटने की तवक़्क़ो तुम से हाथ में हाथ लिया था तो दबाते जाते किन अँधेरों में मुझे छोड़ दिया है तुम ने इस से बेहतर था मुझे आग लगाते जाते मैं भी होता तेरे रस्ते के दरख़्तों में दरख़्त इस तरह देख तो लेता तुझे आते जाते
Abbas Tabish
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न पूछ कितने है बेताब देखने के लिए हम एक साथ कईं ख़्वाब देखने के लिए मैं अपने आप से बाहर निकल के बैठ गया कि आज आएँगे अहबाब देखने के लिए जमाने बा'द बिल-आख़िर वो रात आ गई है कि लोग निकले है महताब देखने के लिए सुनहरी लड़कियों इनको मिलो मिलो न मिलो गरीब होते है बस ख़्वाब देखने के लिए मुझे यक़ीं है कि तुम आईना भी देखोगे मेरी शिकस्त के असबाब देखने के लिए
Abbas Tabish
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