टूटते इश्क़ में कुछ हाथ बँटाते जाते सारा मलबा मेरे ऊपर न गिराते जाते इतनी उजलत में भी क्या आँख से ओझल होना जा रहे थे तो मुझे तुम नज़र आते जाते कम से कम रखता पलटने की तवक़्क़ो तुम से हाथ में हाथ लिया था तो दबाते जाते किन अँधेरों में मुझे छोड़ दिया है तुम ने इस से बेहतर था मुझे आग लगाते जाते मैं भी होता तेरे रस्ते के दरख़्तों में दरख़्त इस तरह देख तो लेता तुझे आते जाते
Related Ghazal
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
More from Abbas Tabish
ये बता यौम-ए-मोहब्बत का समाँ है कि नहीं शहर का शहर गुलाबों की दुकाँ है कि नहीं आदतन उस के लिए फूल ख़रीदे वरना नहीं मालूम वो इस बार यहाँ है कि नहीं ये तेरे बा'द जो लेता हूँ मैं लंबी साँसें मुझ को ये जानना है जिस्म में जाँ है कि नहीं हम तो फूलों के एवज़ फूल लिया करते हैं क्या ख़बर इस का रिवाज़ आप के यहाँ है कि नहीं उस गली का तो पता ठीक बताया तू ने ये बता उस में वो दिलदार मकाँ है कि नहीं पहले तो मुझ को दिलाते है वो ग़ुस्सा 'ताबिश' और फिर पूछते है मुँह में ज़बाँ है कि नहीं
Abbas Tabish
13 likes
कोई टकरा के सुबुक-सर भी तो हो सकता है मेरी ता'मीर में पत्थर भी तो हो सकता है क्यूँँ न ऐ शख़्स तुझे हाथ लगा कर देखूँ तू मिरे वहम से बढ़ कर भी तो हो सकता है तू ही तू है तो फिर अब जुमला जमाल-ए-दुनिया तेरा शक और किसी पर भी तो हो सकता है ये जो है फूल हथेली पे इसे फूल न जान मेरा दिल जिस्म से बाहर भी तो हो सकता है शाख़ पर बैठे परिंदे को उड़ाने वाले पेड़ के हाथ में पत्थर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि बाहर ही नुमू हो मेरी मेरा खिलना मिरे अंदर भी तो हो सकता है ये जो है रेत का टीला मिरे क़दमों के तले कोई दम में मिरे ऊपर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि हम हार के जीतें 'ताबिश' इश्क़ का खेल बराबर भी तो हो सकता है
Abbas Tabish
8 likes
मेरी तन्हाई बढ़ाते हैं चले जाते हैं हंस तालाब पे आते हैं चले जाते हैं इस लिए अब मैं किसी को नहीं जाने देता जो मुझे छोड़ के जाते हैं चले जाते हैं मेरी आँखों से बहा करती है उन की ख़ुशबू रफ़्तगाँ ख़्वाब में आते हैं चले जाते हैं शादी -इ -मार्ग का माहौल बना रहता है आप आते हैं रुलाते हैं चले जाते हैं कब तुम्हें इश्क़ पे मजबूर किया है हम ने हम तो बस याद दिलाते हैं चले जाते हैं आप को कौन तमाशाई समझता है यहाँ आप तो आग लगते हैं चले जाते हैं हाथ पत्थर को बाधाओं तो सगण -इ -दुनिया हैरती बन के दिखते हैं चले जाते हैं
Abbas Tabish
6 likes
तुम हो तो क़रीब और क़रीब-ए-रग-ए-जाँ हो फिर क्यूँ ये मुझे पूछना पड़ता है कहाँ हो मुमकिन है कि इस बाग़ में दम घुटने का बायस ख़ुश्बू जिसे कहते हैं वो फूलों का धुआँ हो तुम सेे तो पढ़ी जाती नहीं अश्कों की सतरें जैसे ये किसी और जहाँ की ज़बाँ हो इस तरह सरे-फ़र्श-ए-'अज़ा बैठी है 'ताबिश' जैसे ये उदासी किसी मक़तूल की माँ हो माँ थी तो मुझे रात नहीं पड़ती थी बाहर अब कोई नहीं पूछता 'अब्बास' कहाँ हो
Abbas Tabish
7 likes
जुदाई का ज़माना यूँँ ठिकाने लग गया था बिछड़ कर उस सेे मैं लिखने लिखाने लग गया था तभी तो ज़ंग आलूदा हुई तलवार मेरी मैं दुश्मन पर मुहब्बत आज़माने लग गया था अभी समझा रहा था वो मुझे बोसे का मतलब कि मैं शहतूत के रस में नहाने लग गया था मोहब्बत हो नहीं पाई तो उस का क्या करूँँ मैं कि मैं तो उस गली में आने जाने लगे गया था तभी तो मेरी आँखों को नहीं रोने की आदत मैं छोटी उम्र में आँसू छुपाने लग गया था
Abbas Tabish
19 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Abbas Tabish.
Similar Moods
More moods that pair well with Abbas Tabish's ghazal.







