तुम हो तो क़रीब और क़रीब-ए-रग-ए-जाँ हो फिर क्यूँ ये मुझे पूछना पड़ता है कहाँ हो मुमकिन है कि इस बाग़ में दम घुटने का बायस ख़ुश्बू जिसे कहते हैं वो फूलों का धुआँ हो तुम सेे तो पढ़ी जाती नहीं अश्कों की सतरें जैसे ये किसी और जहाँ की ज़बाँ हो इस तरह सरे-फ़र्श-ए-'अज़ा बैठी है 'ताबिश' जैसे ये उदासी किसी मक़तूल की माँ हो माँ थी तो मुझे रात नहीं पड़ती थी बाहर अब कोई नहीं पूछता 'अब्बास' कहाँ हो
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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टूटते इश्क़ में कुछ हाथ बँटाते जाते सारा मलबा मेरे ऊपर न गिराते जाते इतनी उजलत में भी क्या आँख से ओझल होना जा रहे थे तो मुझे तुम नज़र आते जाते कम से कम रखता पलटने की तवक़्क़ो तुम से हाथ में हाथ लिया था तो दबाते जाते किन अँधेरों में मुझे छोड़ दिया है तुम ने इस से बेहतर था मुझे आग लगाते जाते मैं भी होता तेरे रस्ते के दरख़्तों में दरख़्त इस तरह देख तो लेता तुझे आते जाते
Abbas Tabish
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ये बता यौम-ए-मोहब्बत का समाँ है कि नहीं शहर का शहर गुलाबों की दुकाँ है कि नहीं आदतन उस के लिए फूल ख़रीदे वरना नहीं मालूम वो इस बार यहाँ है कि नहीं ये तेरे बा'द जो लेता हूँ मैं लंबी साँसें मुझ को ये जानना है जिस्म में जाँ है कि नहीं हम तो फूलों के एवज़ फूल लिया करते हैं क्या ख़बर इस का रिवाज़ आप के यहाँ है कि नहीं उस गली का तो पता ठीक बताया तू ने ये बता उस में वो दिलदार मकाँ है कि नहीं पहले तो मुझ को दिलाते है वो ग़ुस्सा 'ताबिश' और फिर पूछते है मुँह में ज़बाँ है कि नहीं
Abbas Tabish
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कोई टकरा के सुबुक-सर भी तो हो सकता है मेरी ता'मीर में पत्थर भी तो हो सकता है क्यूँँ न ऐ शख़्स तुझे हाथ लगा कर देखूँ तू मिरे वहम से बढ़ कर भी तो हो सकता है तू ही तू है तो फिर अब जुमला जमाल-ए-दुनिया तेरा शक और किसी पर भी तो हो सकता है ये जो है फूल हथेली पे इसे फूल न जान मेरा दिल जिस्म से बाहर भी तो हो सकता है शाख़ पर बैठे परिंदे को उड़ाने वाले पेड़ के हाथ में पत्थर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि बाहर ही नुमू हो मेरी मेरा खिलना मिरे अंदर भी तो हो सकता है ये जो है रेत का टीला मिरे क़दमों के तले कोई दम में मिरे ऊपर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि हम हार के जीतें 'ताबिश' इश्क़ का खेल बराबर भी तो हो सकता है
Abbas Tabish
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दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस जो तअल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं घर पहुँचता है कोई और हमारे जैसा हम तेरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं किस तरह लोग चले जाते हैं उठ कर चुप -चाप हम तो ये ध्यान में लेट हुए मर जाते हैं उन के भी क़त्ल का इल्ज़ाम हमारे सर है जो हमें ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं ये मोहब्बत की कहानी नहीं मरती लेकिन लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं हम हैं वो टूटी हुई कश्तियों वाले 'ताबिश ' जो किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं
Abbas Tabish
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जुदाई का ज़माना यूँँ ठिकाने लग गया था बिछड़ कर उस सेे मैं लिखने लिखाने लग गया था तभी तो ज़ंग आलूदा हुई तलवार मेरी मैं दुश्मन पर मुहब्बत आज़माने लग गया था अभी समझा रहा था वो मुझे बोसे का मतलब कि मैं शहतूत के रस में नहाने लग गया था मोहब्बत हो नहीं पाई तो उस का क्या करूँँ मैं कि मैं तो उस गली में आने जाने लगे गया था तभी तो मेरी आँखों को नहीं रोने की आदत मैं छोटी उम्र में आँसू छुपाने लग गया था
Abbas Tabish
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