कोई टकरा के सुबुक-सर भी तो हो सकता है मेरी ता'मीर में पत्थर भी तो हो सकता है क्यूँँ न ऐ शख़्स तुझे हाथ लगा कर देखूँ तू मिरे वहम से बढ़ कर भी तो हो सकता है तू ही तू है तो फिर अब जुमला जमाल-ए-दुनिया तेरा शक और किसी पर भी तो हो सकता है ये जो है फूल हथेली पे इसे फूल न जान मेरा दिल जिस्म से बाहर भी तो हो सकता है शाख़ पर बैठे परिंदे को उड़ाने वाले पेड़ के हाथ में पत्थर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि बाहर ही नुमू हो मेरी मेरा खिलना मिरे अंदर भी तो हो सकता है ये जो है रेत का टीला मिरे क़दमों के तले कोई दम में मिरे ऊपर भी तो हो सकता है क्या ज़रूरी है कि हम हार के जीतें 'ताबिश' इश्क़ का खेल बराबर भी तो हो सकता है
Related Ghazal
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
315 likes
तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
235 likes
More from Abbas Tabish
तुम हो तो क़रीब और क़रीब-ए-रग-ए-जाँ हो फिर क्यूँ ये मुझे पूछना पड़ता है कहाँ हो मुमकिन है कि इस बाग़ में दम घुटने का बायस ख़ुश्बू जिसे कहते हैं वो फूलों का धुआँ हो तुम सेे तो पढ़ी जाती नहीं अश्कों की सतरें जैसे ये किसी और जहाँ की ज़बाँ हो इस तरह सरे-फ़र्श-ए-'अज़ा बैठी है 'ताबिश' जैसे ये उदासी किसी मक़तूल की माँ हो माँ थी तो मुझे रात नहीं पड़ती थी बाहर अब कोई नहीं पूछता 'अब्बास' कहाँ हो
Abbas Tabish
7 likes
टूटते इश्क़ में कुछ हाथ बँटाते जाते सारा मलबा मेरे ऊपर न गिराते जाते इतनी उजलत में भी क्या आँख से ओझल होना जा रहे थे तो मुझे तुम नज़र आते जाते कम से कम रखता पलटने की तवक़्क़ो तुम से हाथ में हाथ लिया था तो दबाते जाते किन अँधेरों में मुझे छोड़ दिया है तुम ने इस से बेहतर था मुझे आग लगाते जाते मैं भी होता तेरे रस्ते के दरख़्तों में दरख़्त इस तरह देख तो लेता तुझे आते जाते
Abbas Tabish
12 likes
ये बता यौम-ए-मोहब्बत का समाँ है कि नहीं शहर का शहर गुलाबों की दुकाँ है कि नहीं आदतन उस के लिए फूल ख़रीदे वरना नहीं मालूम वो इस बार यहाँ है कि नहीं ये तेरे बा'द जो लेता हूँ मैं लंबी साँसें मुझ को ये जानना है जिस्म में जाँ है कि नहीं हम तो फूलों के एवज़ फूल लिया करते हैं क्या ख़बर इस का रिवाज़ आप के यहाँ है कि नहीं उस गली का तो पता ठीक बताया तू ने ये बता उस में वो दिलदार मकाँ है कि नहीं पहले तो मुझ को दिलाते है वो ग़ुस्सा 'ताबिश' और फिर पूछते है मुँह में ज़बाँ है कि नहीं
Abbas Tabish
13 likes
जुदाई का ज़माना यूँँ ठिकाने लग गया था बिछड़ कर उस सेे मैं लिखने लिखाने लग गया था तभी तो ज़ंग आलूदा हुई तलवार मेरी मैं दुश्मन पर मुहब्बत आज़माने लग गया था अभी समझा रहा था वो मुझे बोसे का मतलब कि मैं शहतूत के रस में नहाने लग गया था मोहब्बत हो नहीं पाई तो उस का क्या करूँँ मैं कि मैं तो उस गली में आने जाने लगे गया था तभी तो मेरी आँखों को नहीं रोने की आदत मैं छोटी उम्र में आँसू छुपाने लग गया था
Abbas Tabish
19 likes
न पूछ कितने है बेताब देखने के लिए हम एक साथ कईं ख़्वाब देखने के लिए मैं अपने आप से बाहर निकल के बैठ गया कि आज आएँगे अहबाब देखने के लिए जमाने बा'द बिल-आख़िर वो रात आ गई है कि लोग निकले है महताब देखने के लिए सुनहरी लड़कियों इनको मिलो मिलो न मिलो गरीब होते है बस ख़्वाब देखने के लिए मुझे यक़ीं है कि तुम आईना भी देखोगे मेरी शिकस्त के असबाब देखने के लिए
Abbas Tabish
16 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Abbas Tabish.
Similar Moods
More moods that pair well with Abbas Tabish's ghazal.







