“बारिश” ये बारिश जो अक्सर बरसती है मुझ पर तुम्हारी भी ज़ुल्फ़ें भिगाती तो होगी कभी चाय चुस्काते छज्जे पे बैठे तुम्हें भी मेरी याद आती तो होगी जो मैं ने तुम्हें पेश हसरत से की थी किताब-ए-मुहब्बत निशानी वो मेरी उसी के किसी इक सफ़्हे से गुज़रते ग़ज़ल तुम मेरी गुनगुनाती तो होगी करे सरसराहट ये जब भी तुम्हारे बग़ीचे के पीपल के पत्तों को छू कर तुम्हारी मेरी देर रातों की बातों के एहसास फिर से दिलाती तो होगी हुई एक मुद्दत था मेहमाँ किया तुम को बेनागा आता है हर बार सावन ये जैसे छुपाती है जज़्बात मेरे तुम्हारे भी आँसू छुपाती तो होगी
Related Nazm
"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
20 likes
"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
37 likes
"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
25 likes
"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
16 likes
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
73 likes
More from Surendra Bhatia "Salil"
"ग़फ़लत" ये कुछ लम्हे ही होते हैं जो हम जीते हैं ग़फ़लत में कि इक दिन बैठ फ़ुर्सत में कसक महसूस कर लेंगे नहीं होती ख़बर तक भी कि केवल ये ही लम्हे हैं हैं शायद सोहबतों के जो इन्हीं में ख़ुद को जीना है हमें एहसास तब होगा कि जब तन्हा कहीं होंगे न वो होंगे न हम होंगे फ़क़त हर सू ख़ला होगी तो अपनी किस्मतों पर या कि अपनी चाहतों पर भी न खीझेंगे न रोएँगे बस अपना मानी ढूँढेंगे
Surendra Bhatia "Salil"
1 likes
“किर्चें” आज एक पुराना रिश्ता दिखा काफी जर्जर हो चुका था उस की दीवारों से पुरानी यादों की पपड़ियाँ भुर-भुर कर गिर रहीं थीं मैं ने सोचा इतना कमज़ोर तो ना हुआ करता था ये ऐसी हालत कैसे हो गई काफी देर टटोला जाँचा-परखा तो देखा नींव कमज़ोर रह गई थी कमबख़्त भरोसे का सी मेंट काफ़ी कम डला था
Surendra Bhatia "Salil"
0 likes
अज़िय्यत शिकायत यूँँ तो है मुझ को शिकायत क्यूँँ करूँँ लेकिन वो जो चाहे वही समझे वो जो चाहे वही माने मुझे क्यूँँ सोचना उस को जो लाज़िम हो गवारा हो वो उस मानी में उलझे ख़ुश रहे समझे वही जाने मेरे हिस्से में था इक गीत मैं ने कह दिया लिखकर ये अब ता'लीम है उस की वो पहचाने न पहचाने थे हम कब हम सेफ़र जो अब जुदा होंगे कभी यारों वो जब तक चाहता हो रह ले फिर जाए ख़ुदा जाने
Surendra Bhatia "Salil"
0 likes
"पीरी" सुनो जब वक़्त गुज़रेगा तुम्हारे ज़िस्म से होकर लकीरें याद की रुख़ पर तुम्हारे छोड़ जाएगा ये ढलती उम्र ख़ुद की फिर न तुम को रास आएगी दग़ा कर आइना भी तुम सेे नाता तोड़ जाएगा सभी सामान ओ साज़-ए-नाज़ तुम को बे-सबब होंगे तुम्हारा दिल सँवरने से भी जब मुँह मोड़ जाएगा तब अपने घर की छत पर बैठ यादों की किताबों में मेरे क़िस्सों मेरी बातों के पन्नों पर नज़र करना मेरे एहसास की बू का 'सलिल' ये इत्र सौंधा सा तुम्हारी साँस में मेरी महक इक छोड़ जाएगा
Surendra Bhatia "Salil"
0 likes
“इब्तिदा” फिर इक सफ़र की इब्तिदा कितने सफ़र की मंज़िलें इक पाँव आगे को बढ़ा पिछला क़दम थमता लगे दो चार दिन की कश्मकश दो चार पल का राब्ता फिर से पुरानी याद में दिल बे-वजह रमता लगे कुछ ख़्वाब अटके से लगें फिरकी में आ कर वक़्त की ये सोचते हैं मैं चलूँ मैं सोचता हूँ ये चलें वो शाम को कहते हैं मुझ सेे सुब्ह आई ही नहीं अब राह ताकूँ रात की ये अब ढले या तब ढले चलना पड़ेगा उम्र भर इक बार जो इक डग भरा माज़ी चलेगा संग-संग अब दिल जले या जाँ जले
Surendra Bhatia "Salil"
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Surendra Bhatia "Salil".
Similar Moods
More moods that pair well with Surendra Bhatia "Salil"'s nazm.







