"ग़फ़लत" ये कुछ लम्हे ही होते हैं जो हम जीते हैं ग़फ़लत में कि इक दिन बैठ फ़ुर्सत में कसक महसूस कर लेंगे नहीं होती ख़बर तक भी कि केवल ये ही लम्हे हैं हैं शायद सोहबतों के जो इन्हीं में ख़ुद को जीना है हमें एहसास तब होगा कि जब तन्हा कहीं होंगे न वो होंगे न हम होंगे फ़क़त हर सू ख़ला होगी तो अपनी किस्मतों पर या कि अपनी चाहतों पर भी न खीझेंगे न रोएँगे बस अपना मानी ढूँढेंगे
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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है
Sandeep Thakur
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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“बारिश” ये बारिश जो अक्सर बरसती है मुझ पर तुम्हारी भी ज़ुल्फ़ें भिगाती तो होगी कभी चाय चुस्काते छज्जे पे बैठे तुम्हें भी मेरी याद आती तो होगी जो मैं ने तुम्हें पेश हसरत से की थी किताब-ए-मुहब्बत निशानी वो मेरी उसी के किसी इक सफ़्हे से गुज़रते ग़ज़ल तुम मेरी गुनगुनाती तो होगी करे सरसराहट ये जब भी तुम्हारे बग़ीचे के पीपल के पत्तों को छू कर तुम्हारी मेरी देर रातों की बातों के एहसास फिर से दिलाती तो होगी हुई एक मुद्दत था मेहमाँ किया तुम को बेनागा आता है हर बार सावन ये जैसे छुपाती है जज़्बात मेरे तुम्हारे भी आँसू छुपाती तो होगी
Surendra Bhatia "Salil"
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कहानी वो ही होती है कहानी जो भी हो चाहे कहानी वो ही होती है वही लड़का वही लड़की जवानी वो ही होती है बदलते वक़्त में केवल हवा तब्दील होती है वो मिलने की बिछड़ने की अदा तब्दील होती है तड़प उतनी ही होती है वो मजनूँ हो कि राँझा हो बदलते वक़्त में केवल सदा तब्दील होती है रगों में दौड़ते ख़ूॅं की रवानी वो ही होती है कहानी जो भी हो चाहे कहानी वो ही होती है मुक़द्दर की रवानी में विरह सहना भी पड़ता है हर इक पल साथ होकर भी जुदा रहना भी पड़ता है किनारे पर खड़े सोहनी को बहते देखते रह कर कभी महिवाल बनकर साथ में बहना भी पड़ता है मुखौटों में छिपी दुनिया सयानी वो ही होती है कहानी जो भी हो चाहे कहानी वो ही होती है
Surendra Bhatia "Salil"
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"पीरी" सुनो जब वक़्त गुज़रेगा तुम्हारे ज़िस्म से होकर लकीरें याद की रुख़ पर तुम्हारे छोड़ जाएगा ये ढलती उम्र ख़ुद की फिर न तुम को रास आएगी दग़ा कर आइना भी तुम सेे नाता तोड़ जाएगा सभी सामान ओ साज़-ए-नाज़ तुम को बे-सबब होंगे तुम्हारा दिल सँवरने से भी जब मुँह मोड़ जाएगा तब अपने घर की छत पर बैठ यादों की किताबों में मेरे क़िस्सों मेरी बातों के पन्नों पर नज़र करना मेरे एहसास की बू का 'सलिल' ये इत्र सौंधा सा तुम्हारी साँस में मेरी महक इक छोड़ जाएगा
Surendra Bhatia "Salil"
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“किर्चें” आज एक पुराना रिश्ता दिखा काफी जर्जर हो चुका था उस की दीवारों से पुरानी यादों की पपड़ियाँ भुर-भुर कर गिर रहीं थीं मैं ने सोचा इतना कमज़ोर तो ना हुआ करता था ये ऐसी हालत कैसे हो गई काफी देर टटोला जाँचा-परखा तो देखा नींव कमज़ोर रह गई थी कमबख़्त भरोसे का सी मेंट काफ़ी कम डला था
Surendra Bhatia "Salil"
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"मेरे हिस्से की यादें" तुम्हारी शा में मुझ सेे थोड़ी ज़्यादा केसरी सी हैं तुम्हारी सुब्हें मुझ सेे थोड़ी ज़्यादा रोशनाई हैं तुम्हें बस याद हैं वो पल जो बेहद ख़ुशनुमा से थे वो रातें 'इश्क़िया सी ही तुम्हें बस याद आई हैं चलो मेरे तो ज़ेहन में हर इक लम्हा वो ताज़ा है के जिस में हम ने ख़ुद को फिर से ढूँढा फिर से पाया था और हो भी क्यूँँ ना वक़्त ने जब से अपना वक़्त बाँटा है मेरे हिस्से में यादें थोड़ी ज़्यादा आई हैं मेरे हिस्से में यादें थोड़ी ज़्यादा आई हैं
Surendra Bhatia "Salil"
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