आलम-ए-इंसानियत क्या देखिए ज़ात मज़हब का तमाशा देखिए जाँ लुटा दी रौशनी के वास्ते कैसा पागल है पतंगा देखिए
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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं
Azhar Iqbal
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उठी थी आग चिंगारी से देखो लगी थी शक कि बीमारी से देखो कि दानाई को तुम रक्खो परे अब निभा के तुम भी दिलदारी से देखो
Manish Pithaya
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ज़िंदगी तू बदल गई लेकिन हम से क्या हो सका मोहब्बत में
Manish Pithaya
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अना जब छोड़ देगी सारी दुनिया फिर उल्फ़त ही बचेगी आदमी में
Manish Pithaya
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सदा हो आसरा बस आप का यूँँ कि साँसें बीत जाएँ बंदगी में
Manish Pithaya
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हूँ मुश्त-ए-ख़ाक तू उपकार कर दे हक़ीक़त का मुझे हक़दार कर दे शिकायत-गर भी करते हैं तशक्कुर तू जिस की ज़िंदगी हमवार कर दे
Manish Pithaya
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