अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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तन्हाई से चौंके जो कभी ख़ुद को पुकारा ख़ामोशी से घबराए तो ज़ंजीर हिला दी
Abbas Qamar
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हालत-ए-हाल से बेगाना बना रक्खा है ख़ुद को माज़ी का निहाँ-ख़ाना बना रक्खा है
Abbas Qamar
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जब तक जला ये हम भी जले इस के साथ साथ जब बुझ गया चराग़ तो सोना पड़े हमें
Abbas Qamar
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हम आसमाँ के लोग थे जन्नत से आए थे ख़ुद को मगर ज़मीं में बोना पड़ा हमें
Abbas Qamar
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मैं पीछे भागने वालों में सब से आगे हूँ ये मेरी आख़िरी कोशिश है ख़ुद को पाने की
Abbas Qamar
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