sherKuch Alfaaz

बात करते हुए बे-ख़याली में ज़ुल्फ़ें खुली छोड़ दी हम निहत्थों पे उस ने ये कैसी बलाएँ खुली छोड़ दी साथ जब तक रहे एक लम्हे को भी रब्त टूटा नहीं उस ने आँखें अगर बंद कर ली तो बाँहें खुले छोड़ दी

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ख़ुद बुलाओ कि वो यूँँ घर से नहीं निकलेगा यहाँ इनआ'म मुक़द्दर से नहीं निकलेगा ऐसे मौसम में बिना काम के आया हुआ शख़्स इतनी जल्दी तेरे दफ़्तर से नहीं निकलेगा

Khurram Afaq

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अब ऐसे ज़ाविए पर लौ रखी जाने लगी है चराग़ों के तले भी रौशनी जाने लगी है नया पहलू सलीक़े से बयाँ करना पड़ेगा कहानी अब तवज्जोह से सुनी जाने लगी है

Khurram Afaq

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बुरा बनता हूँ कि शायद ऐसे वो मिरे सामने अच्छा बन जाए

Khurram Afaq

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नताएज जब सर-ए-महशर मिलेंगे मोहब्बत के अलग नंबर मिलेंगे तुम्हारी मेज़बानी के बहाने कोई दिन हम भी अपने घर मिलेंगे

Khurram Afaq

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किए कराए का सारा हिसाब दूँगा मैं सवाल जो भी करोगे जवाब दूँगा मैं ये रख-रखाव कभी ख़त्म होने वाला नहीं बिछड़ते वक़्त भी तुझ को गुलाब दूँगा मैं

Khurram Afaq

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