बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा
Tehzeeb Hafi
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वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता
Parveen Shakir
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सख़्ती थोड़ी लाज़िम है पर पत्थर होना ठीक नहीं हिन्दू मुस्लिम ठीक है साहब कट्टर होना ठीक नहीं
Salman Zafar
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आप की सादा दिली ख़ुद आप की तौहीन है हुस्न वालों को ज़रा मग़रूर होना चाहिए
Abbas Qamar
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काम आया तिरंगा कफ़न के लिए कोई क़ुर्बां हुआ था वतन के लिए सोचो क्या कर लिया तुम ने जी कर के दोस्त नस भी काटी तो बस इक बदन के लिए
Neeraj Neer
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कोई वीरानी सी वीरानी है दश्त को देख के घर याद आया
Mirza Ghalib
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बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का
Mirza Ghalib
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आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना 'ग़ालिब' किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बा'द
Mirza Ghalib
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दिखा के जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हम को न दे जो बोसा तो मुँह से कहीं जवाब तो दे
Mirza Ghalib
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ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता
Mirza Ghalib
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