sherKuch Alfaaz

बेहतर है रह गया जो कोई सच अधूरा तो उम्मीदें टूट जाती हैं सब जान लेने पर

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थी दिल-लगी की ख़बर हमें भी था इल्म उन को भी आशिक़ी का ये हादसा है कि अपनी-अपनी जगह पे दोनों मुकर गए हैं

Rehaan

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शिकस्त-ए-दिल है ग़म ऐसा कहीं लज़्ज़त नहीं आती मिले कितने भी ता'ने फिर मगर ज़िल्लत नहीं आती गुमाँ है हुस्न पे उस को चढ़ा हमपे ख़ुमार-ए-इश्क़ उसे उल्फ़त नहीं आती हमें ग़ैरत नहीं आती

Rehaan

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था दौर क्या ख़ूब जब हुआ करते थे चमकता सितारा हम भी ये हादसा है कि फिर सितारे को चाँद से हो गई मोहब्बत

Rehaan

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न मिली नज़र कभी नज़रों से कभी उस सेे कुछ ही न बात की हूँ उदास फिर भी मैं देख के उसे साथ में किसी और के आज

Rehaan

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ये इल्म के साथ भी कि शायद यही मुलाक़ात आख़िरी हो मैं जा रहा हूँ उसे कोई अलविदा वगैरह कहे बिना ही

Rehaan

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