दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही
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मेहरबाँ हम पे हर इक रात हुआ करती थी आँख लगते ही मुलाक़ात हुआ करती थी हिज्र की रात है और आँख में आँसू भी नहीं ऐसे मौसम में तो बरसात हुआ करती थी
Ismail Raaz
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अब उस की शादी का क़िस्सा न छेड़ो बस इतना कह दो कैसी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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नई फ़स्लों को ये कुछ और से कुछ और करते हैं गुलाबों की जो ख़ुशबू ढूॅंढ़ते हैं रातरानी में
nakul kumar
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दिन में मिल लेते कहीं रात ज़रूरी थी क्या? बेनतीजा ये मुलाक़ात ज़रूरी थी क्या मुझ सेे कहते तो मैं आँखों में बुला लेता तुम्हें भीगने के लिए बरसात ज़रूरी थी क्या
Abrar Kashif
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सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
Khwaja Meer Dard
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ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र-दर-सफ़र आख़िरी साँस तक बे-क़रार आदमी
Nida Fazli
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नक़्शा उठा के और कोई शहर देखिए इस शहर में तो सब से मुलाक़ात हो गई
Nida Fazli
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घी मिस्री भी भेज कभी अख़बारों में कई दिनों से चाय है कड़वी या अल्लाह
Nida Fazli
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उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मालूम न था सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला
Nida Fazli
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हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी जिस को भी देखना हो कई बार देखना
Nida Fazli
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