गुलाब टहनी से टूटा ज़मीन पर न गिरा करिश्में तेज़ हवा के समझ से बाहर हैं
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गुलाब चाँदनी-रातों पे वार आए हम तुम्हारे होंटों का सदक़ा उतार आए हम
Azhar Iqbal
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ज़मीन-ओ-आसमाँ को जगमगा दो रौशनी से दिसम्बर आज मिलने जा रहा है जनवरी से
Bhaskar Shukla
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इतनी जल्दी न गिरा अपने हसीं रुख़ पे नक़ाब तू मुझे ठीक से हैरान तो हो लेने दे
Rajesh Reddy
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अभी कुछ और करिश्में ग़ज़ल के देखते हैं 'फ़राज़' अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं
Ahmad Faraz
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गुलाबों के होंटों पे लब रख रहा हूँ उसे देर तक सोचना चाहता हूँ
Zubair Rizvi
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जहाँ में होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा तेरे लबों पे मेरे लब हों ऐसा कब होगा
Shahryar
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तमाम उम्र का हिसाब माँगती है ज़िंदगी ये मेरा दिल कहे तो क्या कि ख़ुद से शर्मसार है
Shahryar
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है आज ये गिला कि अकेला है 'शहरयार' तरसोगे कल हुजूम में तन्हाई के लिए
Shahryar
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शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को मैं देखता रहा दरिया तिरी रवानी को
Shahryar
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हम ख़ुश हैं हमें धूप विरासत में मिली है अज्दाद कहीं पेड़ भी कुछ बो गए होते
Shahryar
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