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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी

Ali Zaryoun

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दिन में मिल लेते कहीं रात ज़रूरी थी क्या? बेनतीजा ये मुलाक़ात ज़रूरी थी क्या मुझ सेे कहते तो मैं आँखों में बुला लेता तुम्हें भीगने के लिए बरसात ज़रूरी थी क्या

Abrar Kashif

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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है

Jawwad Sheikh

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नाम पे हम क़ुर्बान थे उस के लेकिन फिर ये तौर हुआ उस को देख के रुक जाना भी सब से बड़ी क़ुर्बानी थी मुझ से बिछड़ कर भी वो लड़की कितनी ख़ुश ख़ुश रहती है उस लड़की ने मुझ से बिछड़ कर मर जाने की ठानी थी

Jaun Elia

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हार हो जाती है जब मान लिया जाता है जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है

Shakeel Azmi

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