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हो गया ग्यारह का तो दिखने लगीं मजबूरियाँ बीस का होते ही अपनी नौजवानी छोड़ दी

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तुम्हें जब वक़्त मिल जाए चले आना कभी मिलने उभर आई हैं कुछ बातें वही सब बात करनी हैं तिरी आँखों में रह कर फिर नए कुछ दिन उगाने हैं तिरी ज़ुल्फ़ों तले वो कुछ पुरानी रात करनी हैं

nakul kumar

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कहो क्या हो गया जो मिल न पाए यार से अपने निहारो चाँद को फिर यार के घर द्वार को देखो

nakul kumar

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तुम जैसे ना-मुराद की सुनता रहा है वो जिस ने नहीं सुनी कभी अपनी भी आज तक

nakul kumar

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कुछ नहीं है ज़िंदगी बर्बाद है अब तो मर गया हूँ मैं मुहब्बत को मनाने में कैसे भी गर हो सके मुझ को रिहा कर दे रह नहीं सकता मैं अब इस क़ैद-ख़ाने में

nakul kumar

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ज़ख़्म तारी है साँस भारी है इस तरह ज़िंदगी गुज़ारी है मुझ पे हावी है जैसे तन्हाई और हल्की सी बे-क़रारी है

nakul kumar

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