हो गया ग्यारह का तो दिखने लगीं मजबूरियाँ बीस का होते ही अपनी नौजवानी छोड़ दी
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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का
Javed Akhtar
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वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता
Parveen Shakir
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किताब फ़िल्म सफ़र इश्क़ शा'इरी औरत कहाँ कहाँ न गया ख़ुद को ढूँढ़ता हुआ मैं
Jawwad Sheikh
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा
Tehzeeb Hafi
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भीगीं पलकें देख कर तू क्यूँँ रुका है ख़ुश हूँ मैं वो तो मेरी आँख में कुछ आ गया है ख़ुश हूँ मैं वो किसी के साथ ख़ुश था कितने दुख की बात थी अब मेरे पहलू में आ कर रो रहा है ख़ुश हूँ मैं
Zubair Ali Tabish
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तुम्हें जब वक़्त मिल जाए चले आना कभी मिलने उभर आई हैं कुछ बातें वही सब बात करनी हैं तिरी आँखों में रह कर फिर नए कुछ दिन उगाने हैं तिरी ज़ुल्फ़ों तले वो कुछ पुरानी रात करनी हैं
nakul kumar
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कहो क्या हो गया जो मिल न पाए यार से अपने निहारो चाँद को फिर यार के घर द्वार को देखो
nakul kumar
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तुम जैसे ना-मुराद की सुनता रहा है वो जिस ने नहीं सुनी कभी अपनी भी आज तक
nakul kumar
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कुछ नहीं है ज़िंदगी बर्बाद है अब तो मर गया हूँ मैं मुहब्बत को मनाने में कैसे भी गर हो सके मुझ को रिहा कर दे रह नहीं सकता मैं अब इस क़ैद-ख़ाने में
nakul kumar
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ज़ख़्म तारी है साँस भारी है इस तरह ज़िंदगी गुज़ारी है मुझ पे हावी है जैसे तन्हाई और हल्की सी बे-क़रारी है
nakul kumar
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