sherKuch Alfaaz

ज़ख़्म तारी है साँस भारी है इस तरह ज़िंदगी गुज़ारी है मुझ पे हावी है जैसे तन्हाई और हल्की सी बे-क़रारी है

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मैं न कहती हूँ कि लाओ चाँद तारे तोड़कर बस मुझे इस हाल में ऐसे न जाओ छोड़कर तुम जो हरदम ही मुझे जान-ओ-जहाँ कहते रहे जा रहे हो ज़िंदगी से क्यूँँ भला मुँह मोड़कर

nakul kumar

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तेरे जाने के बा'द ये मुझे महसूस हुआ है तेरे आने के बा'द भी बहारें आ नहीं सकतीं

nakul kumar

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जिस की ख़ातिर शे'र लिखे हैं अश्क भरे पैमानों से उस लड़की का नाम ग़ज़ल है शे'र नहीं कह पाती है कोई तो समझाओ उस को दिल मेरा वीराना है वो लड़की जो ख़्वाब में अक्सर आती है रह जाती है

nakul kumar

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कहो क्या हो गया जो मिल न पाए यार से अपने निहारो चाँद को फिर यार के घर द्वार को देखो

nakul kumar

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सोच कर ये मन की मन में मार देते हैं सभी ख़ास बातें हर किसी से तो कही जाती नहीं

nakul kumar

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