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हम ने वतन के वास्ते क्या ख़ूब लिख दिया हम ने वतन को अपना ही महबूब लिख दिया

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उन की आँखों से जब से पी यारो छोड़ दी तब से मय-कशी यारो रात को छत से चाँद जब देखा याद उन की फिर आ गई यारो

Zeeshan kaavish

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तुझ सेे बिछडूँगा तो पागल नहीं होने वाला हाँ मगर सच है मुकम्मल नहीं होने वाला कोई नुक़सान नहीं होगा उसे पाने में वो खरा सोना है पीतल नहीं होने वाला

Zeeshan kaavish

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ख़ुशी भी रखते हैं और ग़म भी साथ रखते हैं हम अपने ज़ख़्म का मरहम भी साथ रखते हैं

Zeeshan kaavish

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वो मुहब्बत का तलबगार नहीं हो सकता जो सितमगर है उसे प्यार नहीं हो सकता तेरे होते हुए जो चाँद का दीदार करे कुछ भी होगा वो समझदार नहीं हो सकता

Zeeshan kaavish

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तुझे ख़बर भी है ऐ बे-वफ़ा हज़ारों ने हयात काट दी रो रो के ग़म के मारों ने मिलूँ मैं चाँद से अपने तो किस तरह से मिलूँ फ़लक को घेर लिया है कई सितारों ने

Zeeshan kaavish

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