sherKuch Alfaaz

इश्क़ को ढोता हुआ इक ख़र गया मुझ में अक़्ल कुछ बाक़ी थी आके चर गया मुझ में फ़लसफ़ी अंदाज़ ये है आप की नेमत शा'इरी करता था जो कल मर गया मुझ में

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ज़िक्र होता है तिरा जब भी धड़कता दिल बहुत है भूलना तुझ को सितमगर आज भी मुश्किल बहुत है

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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ख़ुदाया ज़िंदगी में काश ये वक़्फ़ा नहीं होता यहाँ पेशानियों का बोझ तक हल्का नहीं होता गुज़र जाते ये दिन हैं वाक़िआत-ए-रोज़-मर्रा में मगर ये रात का साया कभी धुँदला नहीं होता

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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साथ दिया है किस ने किस का किस की सोहबत कौन चलेगा मेरी ज़िल्लत मेरी ख़िफ़्फ़त ले कर तोहमत कौन चलेगा

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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घूमता है दिल में मेरे एक नम ख़याल किस तरह से खोजते हैं लोग हम ख़याल

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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जिस तरफ़ भी हाथ डाला ग़म निकल आए हो रफ़ू कैसे बदन की दम निकल आए खा रहा था अक्स तेरा जो रहा मुझ में थे नहीं महफूज़ ख़ुद में हम निकल आए

Dhiraj Singh 'Tahammul'

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