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इश्क़ से अपने कुछ चुने लम्हें अनकहे और अनसुने लम्हें आओ मिल कर जियें दुबारा से सर्द रातों के गुनगुने लम्हें

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गुल सा तू तेरा साथ ख़ुशबू सा हाथ में तेरा हाथ ख़ुशबू सा हो के तुझ से जुदा भटकता हूँ गुल से बिछड़ी अनाथ ख़ुशबू सा

Sandeep Thakur

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आ के नज़दीक मुँह न फेर ग़ज़ल पास आ बैठ थोड़ी देर ग़ज़ल सब तेरे नूर से चमकते हैं लफ़्ज़ मिसरे ख़याल शे'र ग़ज़ल

Sandeep Thakur

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चाँद चेहरा मुझे क़बूल नहीं अब समझने में कोई भूल नहीं आँख बस आँख ही है झील नहीं होंठ बस होंठ ही हैं फूल नहीं

Sandeep Thakur

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हर शे'र हर ग़ज़ल पे है ऐसी छाप तेरी तस्वीर बन रही है इक अपने आप तेरी तेरे लिए किसी को इतना दीवाना देखा लगने लगी है मुझ को चाहत भी पाप तेरी

Sandeep Thakur

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आज पलटे जो ख़्बाब के पन्ने मैं ने दिल की किताब के पन्ने वक़्त ने देख मोड़ रक्खे हैं तेरे हुस्नो शबाब के पन्ने

Sandeep Thakur

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