sherKuch Alfaaz

जाँनशीन-ए-इश्क़ हो तो तल्खियाँ अंदर रखो नरमियाँ लाज़िम हैं हुब में सख्तियाँ अंदर रखो

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वो इक नदी जो कभी तेज़-तेज़ बहती थी वो आज रेत के मैदान सी बिछी हुई है मैं इक दरख़्त था 'अशरफ़' किसी ज़माने में खिज़ां के कहरस अब ठूँठ ही बची हुई है

Ashraf Ali

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रोज़ खोता हूँ ख़यालों में तुम्हारी जानाँ रोज़ धुँधली हुई तस्वीर उभर आती है

Ashraf Ali

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जो भी मुझ में बाक़ी है गड़बड़ी निकालूँगा चाबियाँ बनाऊँगा, हथकड़ी निकालूँगा ये जो तुम शरीफ़ों को धौंस देते फिरते हो एक दिन तुम्हारी भी हेकड़ी निकालूँगा

Ashraf Ali

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बे-वजह नज़्म-सराई से मुझे क्या लेना तेरी अंगुश्त-नुमाई से मुझे क्या लेना तुझ को पाने की तमन्ना ही नहीं रखता मैं फिर तेरे बाप से भाई से मुझे क्या लेना

Ashraf Ali

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सारी दुनिया को अजनबी कर के ख़ुश हूँ ख़ल्वत से दोस्ती कर के

Ashraf Ali

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