sherKuch Alfaaz

बे-वजह नज़्म-सराई से मुझे क्या लेना तेरी अंगुश्त-नुमाई से मुझे क्या लेना तुझ को पाने की तमन्ना ही नहीं रखता मैं फिर तेरे बाप से भाई से मुझे क्या लेना

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वो इक नदी जो कभी तेज़-तेज़ बहती थी वो आज रेत के मैदान सी बिछी हुई है मैं इक दरख़्त था 'अशरफ़' किसी ज़माने में खिज़ां के कहरस अब ठूँठ ही बची हुई है

Ashraf Ali

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जो भी मुझ में बाक़ी है गड़बड़ी निकालूँगा चाबियाँ बनाऊँगा, हथकड़ी निकालूँगा ये जो तुम शरीफ़ों को धौंस देते फिरते हो एक दिन तुम्हारी भी हेकड़ी निकालूँगा

Ashraf Ali

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पुतलियों में घुला समुंदर है मोतियों की दुकान आँखें हैं आप तहक़ीक़ ही नहीं करते सब ख़ज़ानों की खान आँखें हैं

Ashraf Ali

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कोई दस्तक़ हुई दरीचे से तितलियाँ उड़ गईं बग़ीचे से थोड़ी शा'इस्तगी ज़रूरी है टूट जाती है डोर खींचे से

Ashraf Ali

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फ़िलहाल मेरे ग़म की दवा कुछ भी नहीं है सब ठीक नहीं और हुआ कुछ भी नहीं है तुम भी वही हम भी वही हालात वही हैं हर बात पुरानी है नया कुछ भी नहीं है

Ashraf Ali

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