जहाँ के सर से काली रात का आंचल सरक जाए खिलें फिर फूल ख़ुशियों के चमन सारा महक जाए अगर ये रात लंबी है मिरे रब कुछ तो ऐसा कर इन आँखों में उमीदों का कोई जुगनू चमक जाए
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मेहरबाँ हम पे हर इक रात हुआ करती थी आँख लगते ही मुलाक़ात हुआ करती थी हिज्र की रात है और आँख में आँसू भी नहीं ऐसे मौसम में तो बरसात हुआ करती थी
Ismail Raaz
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे
Jaun Elia
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मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में
Ammar Iqbal
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अब मैं सारे जहाँ में हूँ बदनाम अब भी तुम मुझ को जानती हो क्या
Jaun Elia
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ज़रा सी पी जो ली हम ने बपा है क्यूँ ये हंगामा दिवाने मीर-ओ-ग़ालिब के करें ना ये करें तो क्या
Aditya
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तुम्हारे चाहने वाले हज़ारों लोग हैं लेकिन हमारे जैसा उन में कोई लासानी हो तो जानू
Aditya
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ये जो कुछ घर तुम्हारे और मेरे बीच में हैं ना कि लज्जत इश्क़ में अपने इसी चलते नहीं आती
Aditya
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झूठ कहना मुझे नहीं आता पर चलो इज़्तिहाद करता हूँ अब तेरी याद ख़ुद नहीं आती तौर-ए-रस्मन मैं याद करता हूँ
Aditya
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बस इक ही घूंट पीने पर कभी फिर होंट ना सूखें हमारी प्यास को क्यूँ ऐसा मयखाना नहीं मिलता
Aditya
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