जवान हो गई इक नस्ल सुनते सुनते ग़ज़ल हम और हो गए बूढ़े ग़ज़ल सुनाते हुए
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
Khwaja Meer Dard
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लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिंदी मुस्कुराती है
Munawwar Rana
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कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती नहीं जा मय-कदे से मेरी जवानी उठा के ला
Abdul Hamid Adam
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रात भी नींद भी कहानी भी हाए क्या चीज़ है जवानी भी
Firaq Gorakhpuri
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ख़ुद-कुशी के लिए थोड़ा सा ये काफ़ी है मगर ज़िंदा रहने को बहुत ज़हर पिया जाता है
Azhar Inayati
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वो तड़प जाए इशारा कोई ऐसा देना उस को ख़त लिखना तो मेरा भी हवाला देना
Azhar Inayati
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कभी क़रीब कभी दूर हो के रोते हैं मोहब्बतों के भी मौसम अजीब होते हैं
Azhar Inayati
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इस रास्ते में जब कोई साया न पाएगा ये आख़िरी दरख़्त बहुत याद आएगा
Azhar Inayati
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हर एक रात को महताब देखने के लिए मैं जागता हूँ तिरा ख़्वाब देखने के लिए
Azhar Inayati
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