जज़्बातों को सहज लफ्ज़ों में पिरोता हूँ मैं लिखता फ़क़त वही हूँ जो सच में होता हूँ मैं
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या
Jaun Elia
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मैं ज़िन्दगी में आज पहली बार घर नहीं गया मगर तमाम रात दिल से माँ का डर नहीं गया बस एक दुख जो मेरे दिल से उम्र भर न जाएगा उस को किसी के साथ देख कर मैं मर नहीं गया
Tehzeeb Hafi
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'हर्ष' वस्ल में जितनी मर्ज़ी शे'र कह लो तुम हिज्र के बिना इन में जान आ नहीं सकती
Harsh saxena
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हासिल न कर पाया तुझे मैं मिन्नतों के बा'द भी उम्मीद सेंटा से लगाना लाज़मी भी है मिरा
Harsh saxena
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दुनिया के भरम को कुछ यूँँ तोड़ दिया मैं ने इस बार नसीबों का रुख़ मोड़ दिया मैं ने
Harsh saxena
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काँधे पे उस के सर रखा तो यूँँ लगा मुझे जैसे मना लिए सभी त्यौहार होली में
Harsh saxena
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इस ज़िंदगानी की ग़ज़ल का क़ाफ़िया सा लगता है उस के बिना तो जैसे पूरा घर बुझा सा लगता है यूँँ तो कोई मंदिर नहीं दुनिया में उस के नाम का लेकिन न जाने क्यूँ मुझे वो देवता सा लगता है
Harsh saxena
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