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जिस को समझा था रौशनी-ए-क़मर शख़्स ऐसा वो आबगीना था उस सेे बिछड़े थे सर्द मौसम में साल का पहला ही महीना था

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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ

Ali Zaryoun

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क्या ख़बर कौन था वो, और मेरा क्या लगता था जिस सेे मिल कर मुझे, हर शख़्स बुरा लगता था

Tehzeeb Hafi

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प्यार का रिश्ता ऐसा रिश्ता शबनम भी चिंगारी भी या'नी उन सेे रोज़ ही झगड़ा और उन्हीं से यारी भी

Ateeq Allahabadi

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बिठा दिया है सिपाही के दिल में डर उस ने तलाशी दी है दुपट्टा उतार कर उस ने मैं इस लिए भी उसे ख़ुद-कुशी से रोकता हूँ लिखा हुआ है मेरा नाम जिस्म पर उस ने

Zia Mazkoor

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बड़े नादान हो तुम भी ज़रा समझा करो बातें गले मिल कर जो रोती है बिछड़ कर कितना रोएगी

Ankita Singh

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नए बरस से मुहब्बत नहीं करेंगे हम किसी से इश्क़ में ये आख़िरी दिसंबर है

Puneet Mishra Akshat

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व्यूह के चक्र को तोड़कर आए हैं बे-ख़बर ज़िंदगी छोड़कर आए हैं जिस नदी ने कभी हम को सींचा नहीं उस नदी का सफ़र मोड़कर आए हैं

Puneet Mishra Akshat

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यहाँ अब कौन करता है ज़माने में वफ़ा उल्फ़त यहाँ उल्फ़त के आड़े जिस्म के व्यापार होते हैं मुझे बीता हुआ अपना ज़माना याद आता है कहाँ फिर से वो बचपन के भला इतवार होते हैं

Puneet Mishra Akshat

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तुम से बिछड़ कर और निखरने वाले हैं हम माँ की बाँहों में मरने वाले हैं

Puneet Mishra Akshat

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तुम्हारे ख़्वाब बिछड़े आ रहे हैं हमें ये बारहा तड़पा रहे हैं वहाँ पर तुम किसी से मिल रहे हो यहाँ सिगरट जलाए जा रहे हैं

Puneet Mishra Akshat

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