खेल सारा ही फ़क़त क़िस्मत का है जाँ ख़त्म होती है यहाँ सारी दास्ताँ इश्क़ में मिलना मुक़द्दर है वर्ना तो मिट गए हैं इश्क़ के कितने ही निशाँ
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ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है क्यूँँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम
Sahir Ludhianvi
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हम इक ही लौ में जलाते रहे ग़ज़ल अपनी नई हवा से बचाते रहे ग़ज़ल अपनी दरअस्ल उस को फ़क़त चाय ख़त्म करनी थी हम उस के कप को सुनाते रहे ग़ज़ल अपनी
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारे नाम की हर लड़की से मिला हूँ मैं तुम्हारा नाम फ़क़त तुम पे अच्छा लगता है
Unknown
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तुम मोहब्बत को खेल कहते हो हम ने बर्बाद ज़िंदगी कर ली
Bashir Badr
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तमाम जिस्म को आँखें बना के राह तको तमाम खेल मुहब्बत में इंतिज़ार का है
Munawwar Rana
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सुनो न जान मेरी आज शाम तुम ठहर जाओ शराब की मिरी ये तिश्नगी बुझा के घर जाओ
Shams Amiruddin
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यूँँ मोहब्बत की क़सम खा बिछड़े वहाँ इक अलग दुनिया बसाई हम ने जहाँ मुझ से डरती है मेरी परछाई भी अब सो है मेरे साथ बस तन्हाई यहाँ
Shams Amiruddin
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ख़ुदा से इक लड़ाई यूँँ लड़ी जाए मुआफ़ी बेवफ़ाओं को भी दी जाए सुना है बे-वफ़ाई शिर्क है फिर भी जो आए लौट कर वो अपना ली जाए
Shams Amiruddin
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मुस्कान उस ने छीन ली लब से मिरे मैं धुन सुनाया करता था जिस प्यार के
Shams Amiruddin
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दौलत भी शोहरत भी निछावर तुझ पे सब रस्म-ए-मोहब्बत तुम निभाओ तो सही
Shams Amiruddin
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