ख़ुद को तरतीब दिया आख़िर-ए-कार अज़-सर-ए-नौ ज़िंदगी में तेरा इन्कार बहुत काम आया
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किस लिए देखती हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो
Jaun Elia
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ख़ुश्बू की बरसात नहीं कर पाते हैं हम ख़ुद ही शुरुआत नहीं कर पाते हैं जिस लड़की की बातें करते हैं सब सेे उस लड़की से बात नहीं कर पाते हैं
Gyan Prakash Akul
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तुम भी वैसे थे मगर तुम को ख़ुदा रहने दिया इस तरह तुम को ज़माने से जुदा रहने दिया
Khalil Ur Rehman Qamar
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ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं ने बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला
Bashir Badr
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बिठा दिया है सिपाही के दिल में डर उस ने तलाशी दी है दुपट्टा उतार कर उस ने मैं इस लिए भी उसे ख़ुद-कुशी से रोकता हूँ लिखा हुआ है मेरा नाम जिस्म पर उस ने
Zia Mazkoor
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वो सूरत देख ली हम ने तो फिर कुछ भी न देखा अभी वर्ना पड़ी थी एक दुनिया देखने को
Zafar Iqbal
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काम आई न कुछ दानिश-ओ-दानाई हमारी हारी है तेरे झूठ से सच्चाई हमारी यूँँ है कि यहाँ नाम-ओ-निशाँ तक नहीं तेरा और तुझ से भरी रहती है तन्हाई हमारी
Zafar Iqbal
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बदन का सारा लहू खिंच के आ गया रुख़ पर वो एक बोसा हमें दे के सुर्ख़-रू है बहुत
Zafar Iqbal
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अब के इस बज़्म में कुछ अपना पता भी देना पाँव पर पाँव जो रखना तो दबा भी देना
Zafar Iqbal
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सफ़र पीछे की जानिब है क़दम आगे है मेरा मैं बूढ़ा होता जाता हूँ जवाँ होने की ख़ातिर
Zafar Iqbal
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