ख़ुदा की क़सम उस ने खाई जो आज क़सम है ख़ुदा की मज़ा आ गया
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हम को दिल से भी निकाला गया फिर शहर से भी हम को पत्थर से भी मारा गया फिर ज़हरस भी
Azm Shakri
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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ख़ुशी से काँप रही थीं ये उँगलियाँ इतनी डिलीट हो गया इक शख़्स सेव करने में
Fahmi Badayuni
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दिन ढल गया और रात गुज़रने की आस में सूरज नदी में डूब गया, हम गिलास में
Rahat Indori
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आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे
Ahmad Faraz
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ना-उमीदी बढ़ गई है इस क़दर आरज़ू की आरज़ू होने लगी
Dagh Dehlvi
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हाथ रख कर जो वो पूछे दिल-ए-बेताब का हाल हो भी आराम तो कह दूँ मुझे आराम नहीं
Dagh Dehlvi
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मेरे फसाने को सुन सुन के नींद उड़ती है दुआएँ मुझ को तेरे पासबान देते हैं
Dagh Dehlvi
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आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले
Dagh Dehlvi
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आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
Dagh Dehlvi
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