ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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हम ने अच्छी धाँक जमा रक्खी थी अपनी फिर उस ने छोड़ा और सब पानी कर डाला
Prashant Sharma Daraz
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इस लिए ये महीना ही शामिल नहीं उम्र की जंत्री में हमारी उस ने इक दिन कहा था कि शादी है इस फरवरी में हमारी
Tehzeeb Hafi
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सुब्ह-ए-मग़रूर को वो शाम भी कर देता है शोहरतें छीन के गुमनाम भी कर देता है वक़्त से आँख मिलाने की हिमाकत न करो वक़्त इंसान को नीलाम भी कर देता है
Nadeem Farrukh
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बो देता है ख़्वाहिश फिर रोता है सातों दिन अपना मन ही हर ग़म का गहवारा होता है
nakul kumar
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मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ ये जब्र है कि मैं ख़ुद अपने इख़्तियार में हूँ
Adil Mansuri
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तू किस के कमरे में थी मैं तेरे कमरे में था
Adil Mansuri
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दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए ख़्वाबों की शाल ओढ़ के मैं ऊँघता रहा
Adil Mansuri
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ख़ुद-ब-ख़ुद शाख़ लचक जाएगी फल से भरपूर तो हो लेने दो
Adil Mansuri
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मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर उस ने दीवारों को अपनी और ऊँचा कर दिया
Adil Mansuri
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