ख़ुद-ब-ख़ुद शाख़ लचक जाएगी फल से भरपूर तो हो लेने दो
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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अब तो लगता है कि आ जाएगी बारी मेरी किस ने दे दी तेरी आँखों को सुपारी मेरी
Abrar Kashif
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शाख़-दर-शाख़ होती है ज़ख़्मी जब परिंदा शिकार होता है
Indira Varma
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हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते
Gulzar
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हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ
Qateel Shifai
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तू किस के कमरे में थी मैं तेरे कमरे में था
Adil Mansuri
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किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
Adil Mansuri
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दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए ख़्वाबों की शाल ओढ़ के मैं ऊँघता रहा
Adil Mansuri
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क्यूँँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो
Adil Mansuri
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मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ ये जब्र है कि मैं ख़ुद अपने इख़्तियार में हूँ
Adil Mansuri
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