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लेता नहीं जो साँस भी इक बार चैन से करता रहा है गुफ़्तगू बीयर की कैन से

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तुम्हें जब वक़्त मिल जाए चले आना कभी मिलने उभर आई हैं कुछ बातें वही सब बात करनी हैं तिरी आँखों में रह कर फिर नए कुछ दिन उगाने हैं तिरी ज़ुल्फ़ों तले वो कुछ पुरानी रात करनी हैं

nakul kumar

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कहो क्या हो गया जो मिल न पाए यार से अपने निहारो चाँद को फिर यार के घर द्वार को देखो

nakul kumar

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काम से निकले तो फिर ये लोग सब घर जाएँगे घर न जा पाए तो फिर ये राह में मर जाएँगे कुछ भी कर जाने को आतुर इश्क़ में जो हैं अगर कुछ न कर पाए तो फिर ये कुछ न कुछ कर जाएँगे

nakul kumar

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अब तो होने से रहा जज़्बात पे क़ाबू एक बुलबुल ने कहा है बाज को बाबू घर से निकले हैं मगर राहें नहीं देखीं पत्थरों में ढूँढ़ते फिरते हैं जो आबू

nakul kumar

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इसी ख़ातिर तुझे मिलता नहीं मैं आजकल अक्सर मुझे मालूम है ये मन तिरा भर जाएगा मुझ सेे

nakul kumar

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