logon ne aaram kiya aur chhutti puri ki yakum may ko bhi mazduron ne mazduri ki
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा
Tehzeeb Hafi
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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इतना संगीन पाप कौन करे मेरे दुख पर विलाप कौन करे चेतना मर चुकी है लोगों की पाप पर पश्चाताप कौन करे
Azhar Iqbal
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किताब फ़िल्म सफ़र इश्क़ शा'इरी औरत कहाँ कहाँ न गया ख़ुद को ढूँढ़ता हुआ मैं
Jawwad Sheikh
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और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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तेरे जाने से ज़्यादा हैं न कम पहले थे हम को लाहक़ हैं वही अब भी जो ग़म पहले थे
Afzal Khan
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बना रक्खी हैं दीवारों पे तस्वीरें परिंदों की वगर्ना हम तो अपने घर की वीरानी से मर जाएँ
Afzal Khan
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ये कह दिया है मिरे आँसुओं ने तंग आ कर हमें ब-वक़्त-ए-ज़रूरत निकालिए साहब
Afzal Khan
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परिंदे लड़ ही पड़े जाएदाद पर आख़िर शजर पे लिक्खा हुआ है शजर बराए-फ़रोख़्त
Afzal Khan
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दानिस्ता मुझ आवारा से टकरा के ये दुनिया कहती है कि अंधे हो दिखाई नहीं देता
Afzal Khan
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