मैं अकेला ही नहीं था इश्क़ में जो लिखे उस ने वो ख़त भी देखिए काग़ज़ी है इश्क़ अब तो मानिए काग़ज़ों पर दस्तख़त भी देखिए
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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ख़्वाबों को देखने से मिला कुछ नहीं मुझे लेकिन शब-ए-ज़ुल्मत से गिला कुछ नहीं मुझे
Ravi 'VEER'
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इज़हारों पर पर्दा डालो इश्क़ उतारो सर से अपने वरना इक दिन मरना तुम को जीने से आसान लगेगा
Ravi 'VEER'
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ख़ूब-सूरत पैरहन है ख़ूब-सूरत ये अदा और उस पर मुस्कुराहट जँच रही हो आज तुम
Ravi 'VEER'
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चार दिन की ज़िंदगी जिस में यहाँ रह गए हैं दो ही दिन मेरे लिए
Ravi 'VEER'
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बातें तुम को भाती होगी इश्क़, मुहब्बत, प्यार की लेकिन क्या सुध ली है तुम ने अपने भी घर बार की
Ravi 'VEER'
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