मन ऐसा उलझा है धागों से भी ज़्यादा
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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कैसा दिल और इस के क्या ग़म जी यूँँ ही बातें बनाते हैं हम जी
Jaun Elia
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मिले किसी से गिरे जिस भी जाल पर मेरे दोस्त मैं उस को छोड़ चुका उस के हाल पर मेरे दोस्त ज़मीं पे सबका मुक़द्दर तो मेरे जैसा नहीं किसी के साथ तो होगा वो कॉल पर मेरे दोस्त
Ali Zaryoun
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ये मुहब्बत की किताबें कौन यूँँ कब तक पढ़े कौन मारे रोज़ ही इक बात पे अपना ही मन
nakul kumar
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मंज़िलों का कौन जाने रहगुज़र अच्छी नहीं उस की आँखें ख़ूब-सूरत है नज़र अच्छी नहीं
Abrar Kashif
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तिरा ज़माना मुझ को करता है बदनाम ख़ुदा लगता है तू भी इन की साजिश में शामिल है
Shivangi Shivi
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महशर का दिन आया है अब तो कर्मा बोलेगा
Shivangi Shivi
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तन्हाई सी शा में हैं ख़ामोशी दे जाती हैं
Shivangi Shivi
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ताबीरों को ताबानी दे मौला इस शाइ'र को नादानी दे मौला
Shivangi Shivi
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नाम तुम्हारा लेते हैं जो काम हमारा हो जाता है
Shivangi Shivi
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