मोहब्बत से मोहब्बत मिल गई जैसे कि सहरा में कली इक खिल गई जैसे न जाने कैसे तुम बिन जी रहा था मैं समझ लो हर घड़ी मुश्किल गई जैसे
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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रंग जब बनकर गवाह आया तेरी तासीर का मैं ने ये आलम भी देखा है तेरी तस्वीर का
Krishnakant Kabk
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मशीनेें दुनिया-भर की भी लगा दो चाहे तुम उस के दिल का रस्ता नईं बना पाओगे
Krishnakant Kabk
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सब को ही है तकलीफ़ किसी ना किसी से तो तकलीफ़ को बिल्कुल नहीं तकलीफ़ किसी से
Krishnakant Kabk
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मैं कहूँ भी तो कैसे कहूँ अब ग़ज़ल शे'र भी मेरे तन्हा हैं मेरी तरह
Krishnakant Kabk
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मेरे हाथों से तेरा हाथ इक पल छूट जाता है मुझे अक्सर डरा कर के ये सपना टूट जाता है यहाँ माँझा लिपटने में लगे रहते सभी अपना कोई चुपके से आ कर के पतंगे लूट जाता है
Krishnakant Kabk
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