पहले तो ग़ौर से वो सुनी शा'इरी मिरी ता'रीफ़ कर रही है फिर आवाज़ की मिरी
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बस एक मोड़ मिरी ज़िंदगी में आया था फिर इस के बा'द उलझती गई कहानी मेरी
Abbas Tabish
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किताब फ़िल्म सफ़र इश्क़ शा'इरी औरत कहाँ कहाँ न गया ख़ुद को ढूँढ़ता हुआ मैं
Jawwad Sheikh
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पहले सौ बार इधर और उधर देखा है तब कहीं डर के तुम्हें एक नज़र देखा है
Majrooh Sultanpuri
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पहले लगा था हिज्र में जाएँगे जान से पर जी रहे हैं और भी हम इत्मीनान से
Ankit Maurya
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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सब्र का बाँध जो टूटा तो ज़बाँ से निकला इश्क़ का तीर तभी जा के कमाँ से निकला
Arbab Shaz
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साथ होते तुम जो मेरे ग़म भी होता बेवजह का साथ मेरे तुम नहीं हो ग़म यही बस तुम नहीं हो
Arbab Shaz
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सोच कर जिस को दिल धड़कता है दिल की आवाज़ वो सुनी ही नहीं
Arbab Shaz
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मुस्कुरा कर कमाल कर बैठे ज़िंदगी से सवाल कर बैठे
Arbab Shaz
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सौ अक्स अगर देखने का शौक़ है 'अरबाब' शीशे की तरह आप बिखर क्यूँँ नहीं जाते
Arbab Shaz
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