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पिछले बरस भी हम ने कलाई सजाई थी राखी के धागे आज भी कच्चे नहीं पड़े

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यही तो एक तमन्ना है इस मुसाफ़िर की जो तुम नहीं तो सफ़र में तुम्हारा प्यार चले

Aalok Shrivastav

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अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया मैं आप का रहूॅंगा मगर उम्र भर नहीं

Aalok Shrivastav

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घर में झीने रिश्ते मैं ने लाखों बार उधड़ते देखे चुपके चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा

Aalok Shrivastav

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दिलों की बातें दिलों के अंदर ज़रा सी ज़िद से दबी हुई हैं वो सुनना चाहें, ज़बाँ से सब कुछ मैं करना चाहूँ नज़र से बतियां ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है सुलगती सांसें, तरसती आँखें, मचलती रूहें, धड़कती छतियां

Aalok Shrivastav

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बाज़ार जा के ख़ुद का कभी दाम पूछना तुम जैसे हर दुकान में सामान हैं बहुत आवाज़ बर्तनों की घर में दबी रहे बाहर जो सुनने वाले हैं, शैतान हैं बहुत

Aalok Shrivastav

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