पुराने साल की ठिठुरी हुई परछाइयाँ सिमटीं नए दिन का नया सूरज उफ़ुक़ पर उठता आता है
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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तुम सेे मिल कर इतनी तो उम्मीद हुई है इस दुनिया में वक़्त बिताया जा सकता है
Manoj Azhar
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या'नी कि इश्क़ अपना मुकम्मल नहीं हुआ गर मैं तुम्हारे हिज्र में पागल नहीं हुआ वो शख़्स सालों बा'द भी कितना हसीन है वो रंग कैनवस पे कभी डल नहीं हुआ
Kushal Dauneria
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तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंठ ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने तुझ पे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने
Faiz Ahmad Faiz
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उन के गेसू खुलें तो यार बने बात मेरी इक रबर बैंड ने जकड़ी हुई है रात मेरी
Zubair Ali Tabish
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मक़तल-ए-शौक़ के आदाब निराले हैं बहुत दिल भी क़ातिल को दिया करते हैं सर से पहले
Ali Sardar Jafri
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परतव से जिस के आलम-ए-इम्काँ बहार है वो नौ-बहार-ए-नाज़ अभी रहगुज़र में है
Ali Sardar Jafri
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शब के सन्नाटे में ये किस का लहू गाता है सरहद-ए-दर्द से ये किस की सदा आती है
Ali Sardar Jafri
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ये तेरा गुलिस्ताँ तेरा चमन कब मेरी नवा के क़ाबिल है नग़्मा मिरा अपने दामन में आप अपना गुलिस्ताँ लाता है
Ali Sardar Jafri
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शिकायतें भी बहुत हैं हिकायतें भी बहुत मज़ा तो जब है कि यारों के रू-ब-रू कहिए
Ali Sardar Jafri
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