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प्यार की कुछ बूँद ही मिल जाए तो गुलशन-ए-दिल फिर हरा हो जाएगा दामन-ए-महबूब जिस दम मिल गया आँसुओं का हक़ अदा हो जाएगा

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ताल में पंछी पनघट गागर चौपालें कितना सुंदर गाँव का मंज़र होता है टूटा फूटा गिरा पड़ा कुछ तंग सही अपना घर तो अपना ही घर होता है

SALIM RAZA REWA

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शादाब जिन की ख़ुशबू से हर इक गुलाब है रौशन चमक से जिन की 'रज़ा' आफ़ताब है सूरत वो जिस पे नाज़ है कुल काएनात को वो सूरत-ए-रसूल ख़ुदा की किताब है

SALIM RAZA REWA

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इन दरिंदों को भी सूली पे चढ़ाया जाए बोटियाँ काट के कुत्तों को खिलाया जाए ताकि कोई भी इलाक़ा न पहलगाम बने इस तरह हिन्द से दुश्मन को मिटाया जाए

SALIM RAZA REWA

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तेरे ही प्यार की ख़ुशबू हमेशा साथ रहती है तेरी यादों के लश्कर ने कभी तन्हा नहीं छोड़ा

SALIM RAZA REWA

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वाहिद जमा में और मुज़क्कर में फँस गए कुछ क़ाफ़िए अरुज़ के ख़ंजर में फँस गए कुछ में तो रब्त कुछ में मुअन्नस का ऐब था मेरे हसीन शे'र तो चक्कर में फँस गए

SALIM RAZA REWA

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