सब की हिम्मत नहीं ज़माने में लोग डरते हैं मुस्कुराने में एक लम्हा भी ख़र्च होता नहीं मेरी ख़ुशियों को आने जाने में
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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घर में भी दिल नहीं लग रहा काम पर भी नहीं जा रहा जाने क्या ख़ौफ़ है जो तुझे चूम कर भी नहीं जा रहा रात के तीन बजने को है यार ये कैसा महबूब है जो गले भी नहीं लग रहा और घर भी नहीं जा रहा
Tehzeeb Hafi
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वैसे वो इक फूल है मुझ को भाता है पर ग़ुस्से में पत्थर का हो जाता है
Vishal Singh Tabish
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कहानी में तुम्हारे ज़िक्र भर से मेरा किरदार हल्का हो रहा है
Vishal Singh Tabish
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दोस्त मेरा ये मानना है एक एक हम-सब हैं और ख़ुदा है एक मुझ सेे हर शख़्स रुठ जाता है मेरा होना भी मसअला है एक
Vishal Singh Tabish
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तन्हाई ये तंज करे है तन्हा क्यूँ है यार कहाँ है आगे पीछे चलने वाले
Vishal Singh Tabish
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तुम पर इक दिन मरते मरते मर जाना है, दीवाने को कहाँ ख़बर है घर जाना है एक शब्द तुम को अंधेरे का ख़ौफ़ दिला कर, बा'द में ख़ुद भी जान बूझकर डर जाना है
Vishal Singh Tabish
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