शाम कितनी थी शबीना यार तेरे साथ में क्या हुआ जो था मेरा ही हाथ तेरे हाथ में
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हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
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हम को यारों ने याद भी न रखा 'जौन' यारों के यार थे हम तो
Jaun Elia
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ये जिस्मों को तुम ने लिबासों में रख कर हया की है देखो क़सम झूठी खाई
Kashif Hussain Kashif
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ज़ाहिद तेरे ख़याल में किस ने ख़लल है दी बाक़ी रहा ये दिल में कही बस मलाल है
Kashif Hussain Kashif
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तेरे इन नकाबों में दुनिया बसी है मेरी चाहतों में तो बस बेबसी है
Kashif Hussain Kashif
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वही एक बात करते हो वही दिन रात करते हो
Kashif Hussain Kashif
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न मैं चल सका हूँ न ये जाँ थकी है ग़ज़ब कश्मकश में ये अब ज़िंदगी है सभी ये मुलाज़िम तेरे हो गए हैं मेरी इन निगाहों में बस बेबसी है
Kashif Hussain Kashif
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