शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का
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हम को दिल से भी निकाला गया फिर शहर से भी हम को पत्थर से भी मारा गया फिर ज़हरस भी
Azm Shakri
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हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Mirza Ghalib
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बंसी सब सुर त्यागे है, एक ही सुर में बाजे है हाल न पूछो मोहन का, सब कुछ राधे राधे है
Zubair Ali Tabish
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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क्यूँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा
Javed Akhtar
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दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके पछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर
Meer Taqi Meer
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टक गोर-ए-ग़रीबाँ की कर सैर कि दुनिया में उन ज़ुल्म-रसीदों पर क्या क्या न हुआ होगा
Meer Taqi Meer
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ओहदे से निकलें किस तरह आशिक़ एक अदा उस की है हज़ार-फ़रेब
Meer Taqi Meer
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'मीर' हम मिल के बहुत ख़ुश हुए तुम से प्यारे इस ख़राबे में मिरी जान तुम आबाद रहो
Meer Taqi Meer
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मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
Meer Taqi Meer
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